'डर लगता है, लेकिन पेट के लिए जाना पड़ता है...' बिहार के एक ही गाँव के छह मज़दूरों की छत्तीसगढ़ में मौत
इमेज स्रोत, Shahnawaz Ahmad/BBC बिहार में गया ज़िले के गोटीबांध गाँव में चीख-पुकार मची है. बिहार-झारखंड के बॉर्डर पर पड़ने वाले इस गाँव में इतनी कुर्सियाँ, गाड़ियाँ और नेता शायद ही पहले कभी आए होंगे. लेकिन इस भीड़-भाड़ के बीच ख़ुशबू बेसुध पड़ी हैं. कुछ महिलाओं ने उनको सहारा देकर बैठा रखा है. ख़ुशबू अपने पिता सुंदर भुइया और अपने भाई राजदेव भुइया के शवों के पहुँचने का इंतज़ार कर रही हैं. सुंदर और राजदेव दोनों की ही गुरुवार को छत्तीसगढ़ के बलौदाबाज़ार-भाटपारा ज़िले के बकुलाही के एक स्पंज आयरन प्लांट में हुए विस्फोट में मौत हो गई थी. बीबीसी हिन्दी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें बेसुध ख़ुशबू टूटे-टूटे शब्दों में कहती हैं, "ये लोग पहली बार बाहर कमाने गए थे. पहले घर पर ही रहकर मज़दूरी करके घर चलाते थे. मेरे भाई की अभी शादी हुई थी, उसका दो महीने का बच्चा है, उसका क्या होगा? सरकार उसको लाभ दे." इमेज स्रोत, Shahnawaz Ahmad/BBC मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ. छत्तीसगढ़ के आयरन प्लांट में विस्फ़ोट से छह मज़दूरों की मौत हुई है. ये सभी लोग गोटीबांध गाँव के हैं. इस दुर्घटना में पाँच लोग घायल भी हुए हैं, जो बिहार और झारखंड के हैं. मारे गए लोगों में बदरी भुइया भी हैं. उनके घर मातम पसरा है. पड़ोस में ही झारखंड में रहने वाली उनकी तीन बहनें प्रेमनी, पुष्पा और मुन्नी अपने भाई को अंतिम विदाई देने के लिए पहुँची हैं. घर के बाहर बैठी बूढ़ी माँ का रो-रोकर बुरा हाल है. वह बदरी भुइया की पत्नी का इंतज़ार कर रही हैं. बदरी भुइया का शव लेने परिवार के लोग छत्तीसगढ़ गए हैं. इस घर से दो भाई यानी बदरी और रामस्वरूप भुइया छत्तीसगढ़ के प्लांट में काम करने गए थे. ख़ुशकिस्मती से रामस्वरूप ठीक हैं, लेकिन घर के सबसे बड़े बदरी भुइया अब इस दुनिया में नहीं हैं. आठवीं तक पढ़े-लिखे बदरी भुइया इस मांझी बहुल गाँव में, मांझी समुदाय के बीच सबसे ज़्यादा पढ़े-लिखे थे. इसी जनवरी महीने में गोटीबांध से 14 लोग कमाने के लिए छत्तीसगढ़ गए थे. इनके परिवार वालों का कहना है कि इन्हें एक ठेकेदार 14,000 रुपए महीने के वेतन और रोज़ का खाना-पीना का वादा कर छत्तीसगढ़ ले गए थे. यह गाँव कचरा पंचायत के अंतर्गत आता है. यहाँ के सरपंच पति रामचंद्र यादव ने बीबीसी हिन्दी से कहा, "इस गाँव में पिछड़ा, अति पिछड़ा और महादलित आबादी रहती है. सबसे ज़्यादा मांझी समुदाय के लोग हैं, जिनके 300 वोटर हैं. ये लोग खेत मज़दूरी करके अपना पेट पालते हैं. इस मामले में कौन ठेकेदार इन लोगों को ले गया, इसके बारे में जानकारी नहीं है." इमेज स्रोत, Shahnawaz Ahmad/BBC बदरी भुइया छत्तीसगढ़ क्यों गए थे, यह पूछने पर बदरी के बहनोई विनोद राम बताते हैं, "वह अपनी पढ़ाई-लिखाई के लिए इलाक़े में मशहूर थे. कोई नशा नहीं करते थे. यहीं गाँव में रहकर आस-पास मज़दूरी करके कमाते थे. यह पहली बार था कि ठेकेदार के कहने पर चले गए. उनके छोटे बच्चे हैं जो ट्यूशन पढ़ते हैं, उसका ख़र्च पूरा नहीं पड़ता था. इसलिए वह कमाने बाहर गए." इस हादसे के चश्मदीद जोगिंदर भुइया हैं. वह गाँव लौट आए हैं. जोगिंदर घटना के बारे में बताते हैं, "साढ़े आठ के आस-पास हम लोग साइट पर चले गए. 20 से 25 मिनट हम लोगों ने काम किया और थक गए तो बैठ गए. 10 बजे काले रंग की गैस निकलने लगी. हम लोगों को कुछ दिख नहीं रहा था. एक साहब आए और बोले- भागो, भागो. हम लोग ऊपर की तरफ़ भाग गए." "मैंने एक आदमी से पूछा कि और बाक़ी लोग कहाँ हैं, तो उसने कहा कि उसे किसी के बारे में कुछ नहीं मालूम. हम लोग ऊपर की तरफ़ भागे थे लेकिन जो लोग नीचे की ओर भागे, वे ज़िंदा नहीं बचे. थोड़ी देर बाद पुलिस आई और सबकी लाशें गाड़ी में रखने लगी." इमेज स्रोत, Shahnawaz Ahmad/BBC जोगिंदर बताते हैं कि उन्हें अशोक यादव नाम के ठेकेदार लेकर गए थे. वह पहली बार छत्तीसगढ़ गए थे. उन्होंने 51,000 रुपए का कर्ज़ लिया है, जिसकी किस्त उन्हें हर महीने चुकानी पड़ती है, जोगिंदर इन किस्तों को चुकाने ही छत्तीसगढ़ गए थे. सुंदर और राजदेव भुइया ने भी बहन की शादी के लिए कर्ज़ लिया था, जिसे चुकाने के लिए वह छत्तीसगढ़ गए थे. इस घटना के बाद से ही लोग डरे हुए हैं, ख़ासतौर पर वे लोग जिनके घर के पुरुष बाहर कमाने गए हैं. सुमंती देवी उनमें से एक हैं, उनकी जेठानी का लड़का श्रवण कुमार इस हादसे में मारा गया है. श्रवण महज़ 22 साल का था और उसके दो बच्चे हैं. सुमंती देवी के पति सत्येंद्र भुइया आंध्र प्रदेश में निर्माण मज़दूर हैं. वह कहती हैं, "ठेकेदार यहाँ बोला कि क्रशर वाला काम है, लेकिन वहाँ ले जाकर पता नहीं किस काम में झोंक दिया. श्रवण की मौत के बारे में सुनकर लगा कि मेरे पति का क्या होगा? वह बाहर काम करते हैं तो डर लगता है, लेकिन पेट के लिए जाना पड़ता है." जयराम भुइया एक ऐसे शख़्स हैं, जिन्हें परिवार ने छत्तीसगढ़ जाने नहीं दिया. जयराम भुइया ने बीबीसी हिन्दी को कहा, "हमको भी जाना था. ठेकेदार ने 14,000 रुपए और खाने-पीने की व्यवस्था करने को कहा था, लेकिन मेरे बेटे ने मुझे जाने ही नहीं दिया. अभी जब सबकी मौत की ख़बर आई तो मेरा बेटा रोने लगा और कहने लगा कि देख लो पापा, बाहर जाने पर कौन-कौन से काम कराते हैं." इमेज स्रोत, Shahnawaz Ahmad/BBC इमेज स्रोत, Shahnawaz Ahmad/BBC पलायन बिहार की बड़ी समस्या है. इस राज्य से बड़ी संख्या में श्रमिक दूसरे राज्यों में काम की तलाश में जाते हैं. इस घटना के बाद केंद्रीय मंत्री और गया से सांसद जीतन राम मांझी भी गोटीबांध पहुँचे थे. जीतन राम मांझी ख़ुद भी मांझी समुदाय से आते हैं और गया लोकसभा क्षेत्र भी अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है. बीबीसी हिन्दी ने जीतन राम मांझी से जब बिहारी मज़दूरों के जोखिम भरे काम के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, "कुछ लोग स्पेशलिस्ट होते हैं और कुछ लोग सामान्य काम करते हैं. जो स्पेशलिस्ट होते हैं, उन्हें ज़्यादा पैसा मिलता है, तो स्वाभाविक है कि वह बाहर चले जाते हैं. बाक़ी लोग यहाँ खेती-बाड़ी या अन्य काम में लगे रहते हैं. इसलिए माइग्रेशन होता है. बिहार में यह दिक़्क़त है कि यहाँ ऐसे कारखाने नहीं हैं, जहाँ स्पेशलिस्ट लोग काम कर सकें. 2005 से पहले यहाँ से सारे कारोबारी चले गए थे. अब उन्हें वापस लाने की कोशिश हो रही है." लेकिन नीतीश सरकार के शासन को भी 20 साल बीत चुके हैं. बिहार में कितने साल में परिस्थितियाँ बदलेंगी? इस सवाल पर जीतन राम मांझी 'बहुत जल्द' ऐसा होने का आश्वासन देते हैं. इमेज स्रोत, Shahnawaz Ahmad/BBC इस हादसे के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मज़दूरों की मौत पर शोक प्रकट करते हुए मृत परिवारों के आश्रितों को दो लाख रुपए का मुआवज़ा और घायल मज़दूरों को 50,000 रुपए की सहायता देने की घोषणा की है. इलाक़े के प्रखंड विकास अधिकारी राजू कुमार बताते हैं, "राज्य सरकार द्वारा घोषित मुआवज़ा तो हम लोग तुरंत दिलवा रहे हैं. इसके अलावा लेबर कोर्ट में इनका केस जाएगा, जहाँ इन्हें न्यूनतम 25 लाख रुपए का मुआवज़ा मिलेगा. छत्तीसगढ़ सरकार ने भी आठ लाख रुपए की सहायता देने की घोषणा की है, जिसमें से एक लाख रुपए परिवारों को दे दिए गए हैं." अनुसूचित जाति बहुल इस इलाक़े में रोज़गार के लिए क्या कोई प्रोग्राम है? इस सवाल पर राजू कुमार कहते हैं, "सरकार इस स्तर पर काम कर रही है. इस बार उद्योग विभाग बहुत सक्रिय है. हम लोगों से फ़ीडबैक लिया जा रहा है और हमने कहा है कि यहाँ कृषि आधारित उद्योग लगाए जा सकते हैं." हर हादसे के बाद सरकारी अधिकारियों, नेताओं और मंत्रियों के पास योजनाओं और आश्वासनों की लंबी सूची होती है, लेकिन नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार बहुआयामी यानी मल्टी-डायमेंशनल ग़रीबी में बिहार देश भर में सबसे निचले पायदान पर है. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. 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स्रोत: BBC Hindi