टी-20 वर्ल्ड कप: भारत को रचना है इतिहास तो इनसे रहना होगा सावधान
इमेज स्रोत, Prakash Singh/Getty Images भारतीय क्रिकेट टीम टी-20 विश्व कप में इतिहास रचने से एक जीत दूर ज़रूर है पर उन्हें इस दूरी को ख़त्म करने के लिए पिछले कुछ मैचों में दिखी ख़ामियों को दूर करना होगा. ऐसा करके ही वह लगातार दूसरी बार खिताब जीतने वाली दूसरी टीम बन सकती है. भारत ने न्यूज़ीलैंड से कुछ ही समय पहले टी-20 सीरीज आसानी से 4-1 से जीत ली थी, पर न्यूज़ीलैंड दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ सेमीफ़ाइनल में जिस तरह का प्रदर्शन करके आई है, उससे यह तो साफ़ है कि अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में खेले जाने वाला फ़ाइनल आसान तो नहीं होने वाला है. न्यूज़ीलैंड के कप्तान सेंटनर ने मैच की पूर्व संध्या पर एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, "भीड़ को ख़ामोश करना ही हमारा सबसे बड़ा लक्ष्य है. टी-20 एक अनिश्चित फॉर्मेट है और यहां खेल का रुख छोटे-छोटे पलों से तय होता है. भारत पर घर में विश्व कप जीतने का दवाब है और हम इसी का फ़ायदा उठाने की योजना बना रहे हैं." वहीं भारतीय कप्तान सूर्यकुमार यादव ने मैच की पूर्व संध्या पर संवाददाता सम्मेलन में कहा, "टीम का एकमात्र लक्ष्य फ़ाइनल जीतकर देश को जश्न मनाने का मौका देना है." बीबीसी हिन्दी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें इस विश्व कप में भारत को सबसे ज़्यादा भरोसा अपनी ओपनिंग जोड़ी पर था. पर इसका क्लिक न कर पाना टीम की सबसे बड़ी समस्या है, ख़ासतौर से अभिषेक शर्मा का नहीं चल पाना. वह इस विश्व कप में इस प्रारूप के नंबर एक बल्लेबाज़ के तौर पर उतरे थे. पर पहले तीन मैचों में खाता नहीं खोल पाने से शायद उनका मनोबल टूटा है. यह समस्या पहली ही गेंद से बड़ा शॉट खेलने का प्रयास करने की वजह से बनी है. भारत ईशान किशन और संजू सैमसन से पारी की शुरुआत कराकर इस समस्या से निजात पा सकता है. पर यह टीम प्रबंधन पर निर्भर करेगा कि क्या वह अभिषेक को एक और मौका देते हैं या नहीं. बहुत संभव है कि टीम प्रबंधन फ़ाइनल में कोई बदलाव करने के पक्ष में न हो. अभिषेक अभी तक खेले सात मैचों में 12.71 के औसत से 89 रन ही बना सके हैं, जिसमें ज़िम्बाब्वे के ख़िलाफ़ 55 रनों की पारी शामिल है. हम यदि इस अर्धशतक को हटा दें तो उनके दयनीय प्रदर्शन की सही तस्वीर सामने आती है. इतना ज़रूर है कि ओपनिंग भारत की कमज़ोर कड़ी ज़रूर है. वह तो भला हो संजू सैमसन का जो उन्होंने शुरुआती मैचों में अनदेखी किए जाने के बावजूद आखिरी दो मैचों में अपने दम पर टीम की नैया पार लगाई. अभिषेक वैसे तो गेंद को बल्ले से अच्छे से कनेक्ट कर रहे हैं. वह यदि विकेट का मिज़ाज समझने के बाद खुलें तो समस्या सुलझ सकती है. न्यूज़ीलैंड की ओपनिंग जोड़ी फिन एलन और टिम साइफर्ट ने इस विश्व कप में जिस विस्फोटक अंदाज़ में बल्लेबाज़ी की है, उसने अपनी टीम के अभियान को फ़ाइनल तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है. फिन एलन तो पावरप्ले में ही गेंदबाज़ों के धुर्रे बिखेरने के लिए जाने जाते हैं. वह कभी यह ख्याल नहीं करते कि सामने कौन गेंदबाज़ है, गेंद पाले में आई तो वह उसे मैदान से बाहर पहुंचाने में गुरेज नहीं करते हैं. उन्होंने इस विश्व कप में दो सौ से ज़्यादा की स्ट्राइक रेट से खेलकर नौ मैचों में 369 रन बनाए हैं. वहीं साइफर्ट ने 10 मैचों में 341 रन बनाए हैं. उनका यह प्रदर्शन यह बताने के लिए काफी है कि भारतीय गेंदबाजों का सिर दर्द यह जोड़ी ही बनने वाली है. मध्यक्रम में रचिन रविंद्र और ग्लेन फिलिप्स पारी को गति देने का माद्दा रखते हैं. ऐसा बहुत कम ही देखने को मिलता है कि भारतीय विकेट पर विदेशी गेंदबाज़ बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं और हमारे स्पिनर प्रभाव ही नहीं छोड़ पा रहे हैं. यह समस्या रहस्यमयी गेंदबाज़ कहलाने वाले वरुण चक्रवर्ती के साथ इस टूर्नामेंट में हो रही है. इंग्लैंड के ख़िलाफ़ सेमीफ़ाइनल में उन्होंने चार ओवरों में 64 रन देकर एक विकेट लिया. इस प्रदर्शन को दोहराने से भारत और वरुण दोनों ही बचना चाहेंगे. इस मैच से एक बात साबित हुई कि दबाव में वह कई बार गेंदबाज़ी की रंगत को खो देते हैं. बेथल ने जिस तरह से उनकी पहली तीन गेंदों पर छक्के लगा दिए, उसके बाद वह कभी सही लाइन और लेंथ पर गेंदबाज़ी करते नज़र नहीं आए. वरुण सुपर आठ के मैचों से ही रंगत में नहीं दिख रहे हैं. वह कई बार दबाव पड़ने पर ज़्यादा रफ़्तार से गेंदबाज़ी करने लगते हैं, जिससे गेंद स्पिन होने की संभावनाएं कम हो जाती हैं. इसका फ़ायदा सामने वाले बल्लेबाज़ उठा रहे हैं. वरुण के प्रदर्शन को हम दो हिस्सों में बांट सकते हैं. पहले चार मैचों में उन्होंने अपनी प्रतिभा के अनुकूल प्रदर्शन किया और नौ विकेट निकाले. लेकिन सुपर आठ से वह अपनी रंगत खो बैठे. कई बार तो लगा कि वह सही लेंथ ही नहीं पकड़ पा रहे हैं. इस दौरान खेले चार मैचों मे वह चार ही विकेट निकाल सके हैं. अक्षर पटेल भी गेंदबाज़ी में बहुत प्रभावित नहीं कर पा रहे हैं. पर वह अपने फ़ील्डिंग और बल्लेबाज़ी से प्रभाव छोड़ने की क्षमता रखते हैं. यह बात वह सेमीफ़ाइनल में दो शानदार कैच पकड़कर साबित कर चुके हैं. वरुण की जगह फ़ाइनल में कुलदीप यादव को खिलाया जा सकता है. पर समस्या यह रहेगी कि वह अभी तक एक भी मैच नहीं खेले हैं, इसलिए टीम प्रबंधन यह जोखिम उठाने का फैसला शायद ही करे. बेहतर हो कि वरुण थोड़ी और सजगता के साथ गेंदबाज़ी करें. हेनरी के करियर का यह आखिरी मैच होगा और वह इसे यादगार बनाना ज़रूर चाहेंगे. वैसे भी वह पावरप्ले में विकेट निकालने में महारत रखते हैं. वह आठ मैचों में दस विकेट निकालकर अच्छी रंगत में भी हैं. वह पावरप्ले में एक-दो विकेट निकालकर भारत पर दबाव बना सकते हैं. लॉकी फर्ग्यूसन ने भले ही छह विकेट निकाले हैं. पर वह अक्सर अपनी गति के दम पर टीम को महत्वपूर्ण सफलताएं दिलाने में महारथ रखते हैं. न्यूज़ीलैंड की स्पिन गेंदबाज़ी में भी कसाव है. कप्तान सेंटनर बहुत सफलताएं तो नहीं पा सके हैं. पर वह मध्य ओवरों में बल्लेबाज़ों पर नकेल कसने में कामयाब रहते हैं. मैककोनी बाएं हाथ के बल्लेबाज़ों को परेशान कर सकते हैं. इसलिए इनसे बचना होगा. इस विश्व कप में हमारे बल्लेबाज़ स्पिनरों को खेलने में बहुत कमज़ोर साबित हुए हैं. इस विश्व कप में भारत का स्पिन के ख़िलाफ़ स्ट्राइक रेट 6.23 रहा है. भारतीय बल्लेबाज़ी के शीर्ष क्रम में बाएं हाथ के बल्लेबाज़ों की भरमार ने इस समस्या को और बढ़ाया है. शीर्ष क्रम में बाएं हाथ के बल्लेबाज़ों के तौर पर अभिषेक शर्मा, ईशान किशन और तिलक वर्मा शामिल हैं. पिछले कुछ मैचों से देखने को मिल रहा है कि ये बल्लेबाज़ स्पिनरों के ख़िलाफ़ न तो चौके-छक्के लगा पा रहे हैं और न ही स्ट्राइक रोटेट कर पा रहे हैं. इस स्थिति का फ़ायदा उठाने के लिए टीमें भारत के ख़िलाफ़ स्पिनर से शुरुआत तक करातीं नज़र आई हैं. भारत को न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ फ़ाइनल में भी इस समस्या का सामना करना पड़ सकता है. उनके ऑफ़ स्पिनर कोल मैककोनी ने इस विश्व कप में बहुत प्रभावित किया है. ख़ासतौर से बाएं हाथ के बल्लेबाज़ों के ख़िलाफ़. साथ ही कप्तान मिचेल सेंटनर भी बहुत अनुभवी गेंदबाज़ हैं. इंग्लैंड के युवा बल्लेबाज़ जैकब बेथल के स्पिनरों के ख़िलाफ़ विस्फोटक अंदाज अपनाने से जसप्रीत बुमराह को गेंदबाज़ी के लिए पहले लाना पड़ा था और उन्होंने अपने दो ओवरों में 14 रन देकर अपना काम कर भी दिया. पर भारत की समस्या यह है कि बुमराह और अर्शदीप के अलावा डेथ ओवरों का कोई अच्छा गेंदबाज़ नहीं है. शिवम दुबे को इसके लिए तैयार किया गया है. वह वाइड यार्कर डालने का प्रयास करते हैं. पर इस तरह की गेंदबाज़ी करने के लिए अच्छा नियंत्रण होना ज़रूरी है. इस कमी की वजह से उन पर कई बार छक्के लग जाते हैं. सेमीफ़ाइनल में उनके आते समय मैच इंग्लैंड की पकड़ से निकल चुका था. लक्ष्य कम होता तो तीन छक्के मामला बिगाड़ सकते थे. इससे पहले भी वह दो ओवरों में 46 रन दे चुके थे. भारत को गेंदबाज़ी इस तरह कराने की ज़रूरत है कि आखिरी के चार ओवर बुमराह के साथ अर्शदीप और हार्दिक ही फेंकते दिखें. मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ. यह सही है कि भारत ने सेमीफ़ाइनल में पिछले मैचों की तुलना में कहीं बेहतर फील्डिंग और कैचिंग का प्रदर्शन किया. अक्षर पटेल के दो कैचों ने मैच का रुख भारत के पक्ष में मोड़ने में अहम भूमिका भी निभाई. पर समस्या पूरे टूर्नामेंट की है. वहीं न्यूज़ीलैंड ने इस क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन किया है. भारत इस विश्व कप में कैच छोड़ने के मामले में 13 कैच छोड़कर पहले पायदान पर है. अभिषेक शर्मा और तिलक वर्मा जैसे बेहतरीन फील्डर ने भी कैच छोड़े हैं. वेस्ट इंडीज के ख़िलाफ़ सुपर आठ मुकाबले में अभिषेक शर्मा का छोड़ा कैच भारत के खतरा बन गया था. इसलिए टीम को इस दिशा में जान लगाकर प्रदर्शन करना होगा. फ़ाइनल के आयोजन स्थल अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम की लाइटों से तालमेल बैठाने में पहले ही फील्डरों को दिक्कत होती रही है. इसलिए भारत को इस दिशा में विशेष प्रयास करके उतरना होगा. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. 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स्रोत: BBC Hindi