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Death

बाबर ने पानीपत की लड़ाई में किस तरह से इब्राहीम लोदी को दी थी मात

✍️ Admin 📅 19 April, 2026 ⏰ 10:35 AM 👁 46 views

भारत पर तैमूर के हमले के क़रीब 125 साल बाद उसकी छठी पीढ़ी के वंशज ज़हीरुद्दीन बाबर ने भी भारत पर हमले का अभियान शुरू किया था. 12 साल की उम्र से ही बाबर का जीवन लड़ाइयों से भरा रहा और कई बार उसने हार का स्वाद भी चखा, लेकिन अपनी हर पराजय के अनुभव से सीखने के जज़्बे को उसने नहीं छोड़ा. आज के दौर के उज़्बेकिस्तान में स्थित फ़रगना का अपना राज्य खो देने के बाद उसने काबुल में अपने-आप को स्थापित किया था. वहाँ से उसने पंजाब पर कई हमले किए थे. उन दिनों पंजाब पर दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी के प्रतिनिधि के तौर पर दौलत ख़ाँ शासन कर रहा था. दौलत खाँ इब्राहीम लोदी के प्रति वफ़ादार नहीं था, अंदर ही अंदर वह इस उम्मीद में बाबर का साथ दे रहा था कि एक दिन वो इब्राहीम लोदी के शासन से आज़ाद हो जाएगा, मगर सन 1525 में बाबर ने उसे हराकर पंजाब पर खुद कब्ज़ा कर लिया था. जाने-माने इतिहासकार जदुनाथ सरकार अपनी किताब 'मिलिट्री हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया' में लिखते हैं, "सन 1517 में दिल्ली का सुल्तान बना इब्राहीम लोदी एक बहादुर व्यक्ति था लेकिन उसके रिश्तेदारों के विद्रोह के कारण उसे कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था." "वो लोग उसे सत्ता से हटाकर अपने अपने स्वतंत्र राज्य बना लेने की फ़िराक में थे. उसकी परेशानी का एक और कारण बाबर के शब्दों में उसकी 'देहाती नासमझी' भी थी जिसकी वजह से उसने बाबर के अनुभवी सैनिकों के ख़िलाफ़ किसी ठोस योजना के तहत काम नहीं किया." "बाबर के सैनिक कड़े अनुशासन के आदी थे और उनका नेतृत्व बहुत क़ाबिल जनरल कर रहे थे." इमेज स्रोत, Sanage Publishing House बाबर ने अपने अभियान की शुरुआत 17 नवंबर, 1525 को सिंध के शहर हैदराबाद से की थी जो अब पाकिस्तान में है. जब बाबर ने सिंधु नदी पार की तो उसने बाक़ायदा अपने सैनिकों की गिनती की थी. गिनती करने पर पता चला कि उसके सैनिकों की संख्या उसकी उम्मीद से कम निकली. उसके पास उस समय कुल 12 हज़ार सैनिक थे. बाद में उसमें पहले के भारत अभियान में पीछे छोड़े गए सैनिक और असंतुष्ट अफ़ग़ान सैनिक भी आ मिले थे. इस सबकी वजह से जब बाबर पानीपत पहुंचा तो उसके सैनिकों की संख्या बढ़कर 20 हज़ार हो चुकी थी. तब भी लोदी की तुलना में उसके सैनिकों की संख्या काफ़ी कम थी. बाबर ने अनुमान लगाया था कि उसके सैनिकों की संख्या कम-से-कम एक लाख रही होगी. साथ ही, उसकी सेना में एक हज़ार हाथी भी थे, लेकिन इब्राहीम लोदी की सेना की बड़ी संख्या का बाबर के पास जवाब था- बेहतर हथियार. इसके बावजूद लोदी की सेना को बेहतर युद्ध कौशल के ज़रिए ही हराया जा सकता था. जदुनाथ सरकार लिखते हैं, "जहाँ बाबर की आगे बढ़ने की तेज़ी देखते ही बनती थी, इब्राहीम लोदी दिन में दो या तीन मील का सफ़र तय करके बहुत धीमे-धीमे आगे बढ़ रहा था. बीच-बीच में वो दो दिन के लिए रुक भी जाता था. उसकी सेना बेतरतीब ढंग से बढ़ते हुए शहर की तरह थी." मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ. इससे पहले बाबर ने अधिकतर लड़ाइयाँ पहाड़ी इलाकों में जीती थीं, जहाँ बड़ी सेना को नहीं भेजा जा सकता था. इन लड़ाइयों का फ़ैसला सेना के आकार से नहीं, बल्कि बुद्धिमानी, इलाके के सामरिक इस्तेमाल और दुश्मन को चकमा देने से होता था. पानीपत में बाबर पहली बार मैदानी इलाके में लड़ाई लड़ रहा था जहाँ सैनिकों की संख्या को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता था. अब्राहम इराली अपनी किताब 'एंपरर्स ऑफ़ द पीकॉक थ्रोन' में लिखते हैं, "बाबर के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी इब्राहीम लोदी के सैनिकों की बड़ी संख्या को अपने बेहतर तोपख़ाने और युद्ध कौशल से बेअसर करना. बाबर की रणनीति थी कि लड़ाई का मैदान जितना सँकरा हो उतना ही बेहतर है, ताकि लोदी के सैनिकों को उसकी छोटी सेना को घेरने का मौका न मिल सके." "इसके बावजूद युद्ध मैदान के सिर्फ़ सँकरे होने से ही काम नहीं चलता क्योंकि बाबर की सेना में इतनी गहराई नहीं थी कि वो लोदी के सीधे हमलों को झेल पाते." "रणनीति बनाने के लिए उसने अपने चोटी के जनरलों की एक बैठक बुलाई जिसमें परंपरागत मुग़ल युद्ध योजना में परिवर्तन किए गए. इसके बाद उसने पानीपत के मैदान का जायज़ा लेने के लिए अपने जासूस भेजे." इमेज स्रोत, Pigeon Publications जासूसों ने रिपोर्ट दी की पानीपत का मैदान बाबर की बजाय इब्राहीम लोदी के अधिक माफ़िक है. मैदान में ऐसा कुछ नहीं था जिसका फ़ायदा बाबर को मिल पाता. वो पूरा इलाका एक चटियल मैदान था जिसमें गिने-चुने पेड़ और कुछ झाड़ियाँ थीं. बाबर ने पानीपत पहुंचकर अपनी सेना को शहर के पूर्व में नगर और यमुना नदी के बीच तैनात किया. उस ज़माने में यमुना नदी नगर के पास ही बहा करती थी. बाबर ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा में लिखा, "मैंने उस्ताद अली कुली को आदेश दिया कि 700 बैलगाड़ियों को ज़ंजीरों से नहीं, बल्कि चमड़े की रस्सियों से आपस में बाँध दिया जाए." "हर दो बैलगाड़ियों के बीच पाँच या छह लकड़ी के फट्टे लगाए जाएँ. उसके पीछे बारूद को जलाने वाले सैनिक कहर बरपाने के लिए तैयार खड़े हों. बाबर ने पाँच या छह दिन तक लड़ाई की पूरी तैयारी की." "जब सब कुछ तैयार हो गया तो उसने अपने सैनिकों को संबोधित करते हुए कहा, 'पानीपत के घर और बस्तियाँ एक तरफ़ से हमारे कवच का काम करेंगी. दूसरी तरफ़ चमड़े के रस्सों से बँधी बैलगाड़ियाँ हमारी रक्षा करेंगी. उनके पीछे हमारे पैदल सैनिक हमला करने के लिए तैयार रहेंगे.' 12 अप्रैल तक बाबर की तैयारी पूरी हो चुकी थी." बाबर की पूरी रणनीति इस बात पर निर्भर करती थी कि इब्राहीम लोदी उस पर हमला करने की पहल करे. बाबर ये मानकर चल रहा था कि लोदी ही पहले हमला करेगा क्योंकि मुग़ल लोदी के इलाके में घुसे थे और ये उनका फ़र्ज़ बनता था कि वो उन्हें वहाँ से निकालने की कोशिश करें. दूसरी तरफ़, इब्राहीम लोदी इस पूरे प्रकरण को दूसरे दृष्टिकोण से देख रहा था. अब्राहम इराली लिखते हैं, "लोदी ने बाबर पर हमला ही नहीं किया. उसका इरादा था कि बाबर को दिल्ली की तरफ़ बढ़ने का रास्ता ही न मिले. उसका मानना था कि रक्षण आक्रमण का सबसे बेहतर तरीका है." "वो इंतज़ार करने का जोखिम उठा सकता था. उधर बाबर तुरंत परिणाम चाहता था ताकि उसके सैनिकों का मनोबल कम न हो. पूरे सात दिनों तक उसने बहुत बेचैनी से लोदी के हमले का इंतज़ार किया." "अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए उसने लोदी के युद्ध कौशल का मज़ाक उड़ाया. उसने लोदी के सैनिकों पर दूर से तीर चलाकर उन्हें भड़काने की कोशिश की. लेकिन लोदी की सेना ने उसे अनदेखा कर दिया." आख़िरकार बाबर को ही अपनी रणनीति में परिवर्तन करना पड़ा और उसने 19 अप्रैल की रात लोदी की सेना पर अचानक हमला बोल दिया. बाबर की सेना के बाएं हिस्से के क़रीब चार हज़ार सैनिकों ने पहले हमला बोला. बाबर अपने बाकी सैनिकों के साथ बीच में इस उम्मीद के साथ खड़ा रहा कि अगर उसके हमलावर सैनिक सफल होते हैं तो वो उनको मिलने वाली बढ़त का फ़ायदा उठाते हुए अपने बाकी के सैनिक भी उस लड़ाई में झोंक देगा. अगर उन्हें सफलता नहीं मिलती है तो उसके सैनिक पीछे हटते हुए सैनिकों को मदद पहुंचाएंगे. बाबर का ये हमला नाकाम रहा. लोदी की सेना को अचंभे में डालने के बजाए उसने पाया कि वो इस हमले के लिए तैयार थे. लेकिन बाबर का ये सौभाग्य था कि इस नाकाम हमले ने उसे वो दे दिया जो वो पहले से ही चाहता था- यानी लोदी के सैनिकों का उसके ठिकानों पर हमला. 20 अप्रैल का दिन अपेक्षाकृत शांत दिन था, लेकिन 21 अप्रैल की सुबह आगे तैनात मुग़ल सैनिकों ने पीछे सूचना भेजी कि लोदी के सैनिकों ने बढ़ना शुरू कर दिया है. संभवत: एक रात पहले हुए बाबर के नाकाम हमले से उन्हें ये उम्मीद जग गई कि मुग़लों को आसानी से वश में किया जा सकता है. ये एक बहुत बड़ी ग़लती साबित हुई. लोदी के सैनिक बाबर के बिछाए जाल में फँसते चले गए. आभास मलदाहियार अपनी किताब 'बाबर द क्वेस्ट फॉर हिंदुस्तान' में लिखते हैं, "बाबर अपने तोपख़ाने और बैलगाड़ियों के जत्थे के साथ उनका इंतज़ार कर रहा था. सबसे पीछे उसने किसी भी स्थिति से निपटने के लिए अपने रिज़र्व सैनिक रखे थे." "जब लोदी के सैनिक बढ़े तो उन्होंने अपने-आप को बाईं तरफ़ पानीपत की दीवार और दाहिनी तरफ़ गडढों और बाधाओं के बीच पाया जिसे मुग़लों ने खोदा था. जैसी ही, लोदी के सैनिक मुग़ल रक्षण के पास आए मुग़लों ने गोलाबारी शुरू कर दी." "सँकरे क्षेत्र से गुज़र रहे अफ़ग़ान सैनिक बुरी तरह से तितर-बितर हो गए. थोड़ी देर में लोदी की सेना.. सेना न रह कर लोगों का झुंड रह गई. वो न तो ढंग से लड़ पाई और न ही पीछे भाग पाई." बाबर के आदेश साफ़ थे. उसने बाबरनामा में लिखा, "मैंने अपनी सेना को आदेश दिया कि वो दुश्मन पर तीरों की बारिश कर दे. मेरे सिपहसालार महदी ख़्वाजा ने तीरों की लगातार बारिश कर लोदी के हाथियों को पीछे भागने पर मजबूर कर दिया." "थोड़ी देर में दुश्मनों को उनके ही घेरे में धकेल दिया गया. उनकी हालत वैसी ही हो गई जैसी मकड़ी के जाल में उसके शिकार की होती है." बाबर ने मौके़ का फ़ायदा उठाते हुए लोदी की सेना पर पीछे से भी हमला बोल दिया. बाबर ने लिखा, "अफ़ग़ान (लोदी के सैनिक) बहादुरी से लड़े लेकिन उनके लिए कोई मौक़ा नहीं था. ये लड़ाई सूर्योदय के समय शुरू हुई थी और दोपहर होने तक लोदी की सेना पूरी तरह से परास्त हो चुकी थी." "मेरे अनुमान के अनुसार अफ़ग़ान सेना के 15 हज़ार से 16 हज़ार सैनिक मारे गए थे. पूरा मैदान दुश्मन के शवों से पटा हुआ था." मरने वालों में इब्राहीम लोदी भी थे. वो दिल्ली के अकेले शासक थे जो लड़ाई के मैदान में मारे गए थे. अब्राहम इराली लिखते हैं, "जब मुग़लों को मृत सुल्तान का शव मिला तो उन्होंने उस समय की परंपरा के अनुसार उसका सिर काट कर स्मृति चिन्ह के तौर पर बाबर के सामने पेश किया." "बाबर ने शव के प्रति आदर दिखाते हुए कहा, 'मैं आपकी बहादुरी का सम्मान करता हूँ.' लड़ाई से पहले इब्राहीम लोदी के बारे में अपशब्द बोलने वाले बाबर ने उसके मृत शरीर को सेल्यूट किया. उसने आदेश दिया कि शव को ज़री के कपड़े से ढका जाए." "उसने अपने सिपहसालारों दिलावर ख़ाँ और अमीर ख़लीफ़ा को आदेश दिया कि इब्राहीम लोदी के शव को नहलाने के बाद उस स्थान पर पूरे सम्मान के साथ दफ़ना दिया जाए जहाँ उसकी मौत हुई थी." बाबर ने अपनी आत्मकथा में लिखा, "भारत का साम्राज्य सिर्फ़ पाँच घंटे की लड़ाई में जीता गया. मैंने हुमायूं को निर्देश दिए कि वो बिना समय गँवाए जितनी जल्दी हो सके लोदी की राजधानी आगरा पर कब्ज़ा करने के लिए बढ़े और वहाँ के ख़ज़ाने को अपने नियंत्रण में ले ले." अगले दिन बाबर ने भी आगरा की राह पकड़ी. बीच में वो दिल्ली में कुछ दिनों के लिए रुका. यहाँ पर भी उसने ख़ज़ाने को अपने नियंत्रण में लिया और शहर के महलों, बागों और पवित्र स्थानों का दौरा किया. वो अलाउद्दीन ख़िलजी और ग्यासुद्दीन बलबन की मज़ारों पर गया. इसके अलावा वो क़ुतुब मीनार, हौज़ ख़ास और सिकंदर लोदी के बाग भी गया. बाबर ने लिखा, "शक्ति के इन सब प्रतीकों का जायज़ा लेने के बाद मैं एक नाव पर चढ़ा और अपनी विजय की ख़ुशी में अरक़ पी. जैसे ही रात हुई मैंने जमुना के किनारे खड़े होकर तुग़लकाबाद के क़िले को निहारा. हर बीतने वाले दिन के साथ हिंदुस्तान पर मेरी पकड़ मज़बूत होती चली गई." बाबर ने ये भी सुनिश्चित किया कि शुक्रवार की नमाज़ में शहर की मुख्य मस्जिद में उसके नाम का ख़ुतबा पढ़ा जाए ताकि उसके शासन को वैधता मिल जाए. ये काम मौलाना महमूद और शेख़ ज़ैन ने पूरा किया. उसने पानीपत से दो हफ़्ते में 280 किलोमीटर का रास्ता तय करते हुए 4 मई को आगरा में प्रवेश किया. एक हफ़्ते तक उसने शहर के बाहरी इलाके़ में एक खुले मैदान में अपना शिविर लगाया. 10 मई को बाबर एक शानदार जुलूस के साथ आगरा में प्रवेश कर इब्राहीम लोदी के महल के सामने अपने घोड़े से नीचे उतरा और हिंदुस्तान के सम्राट के रूप में गद्दी संभाली. उस समय बाबर की उम्र थी 43 वर्ष. उसने हमेशा के लिए भारत में ही बसने का फ़ैसला किया. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

स्रोत: BBC Hindi

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