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महिलाओं में खतना की तुलना पुरुषों से करने पर सीनियर वकील पर भड़का SC, कहा- फैक्ट्स ठीक करिए, मुझे हैरानी है कि...

✍️ Admin 📅 08 May, 2026 ⏰ 09:15 AM 👁 45 views

दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं की खतना प्रथा की तुलना पुरुषों में खतना से करने पर सुप्रीम कोर्ट ने सीनियर वकील से कहा कि उन्हें अपने तथ्यों को सही करने की जरूरत है. कोर्ट ने महिलाओं के खतना पर चिंता जताई और कहा कि यह प्रथा संविधान के तहत स्वास्थ्य के दायरे में आ सकती है.

सुनवाई के दौरान एडवोकेट निजाम पाशा ने इसकी तुलना पुरुषों में खतना प्रथा से की और कहा कि इसका मकसद महिलाओं में यौन सुख को बढ़ाना है. इस पर कोर्ट ने उनसे कहा कि उन्हें अपने तथ्यों को सही करने की जरूरत है, क्योंकि जो वह कह रहे हैं वो बिल्कुल विपरीत बात है. केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने यह टिप्पणी की है. नौ जजों की संविधान बेंच दाऊदी बोहरा समुदाय सहित विभिन्न धर्मों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और दायरे पर भी विचार कर रही है.

खतना प्रथा को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं की तरफ से सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा पेश हुए, जिन्होंने बताया कि सात साल की छोटी बच्चियों का खतना किया जाता है, जिसमें उनकी सार्थक सहमति संभव नहीं है. उन्होंने कहा कि जहां कोई प्रथा शारीरिक स्वायत्तता में अतिक्रमण करती है और किसी महत्वपूर्ण अंग को विकृत करती है, वह अनिवार्य रूप से अनुच्छेद 25 और 26 के तहत सीमाओं, यानी सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता का उल्लंघन करती है.

एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने कोर्ट को बताया कि इस प्रथा का पालन न करने पर लोगों को समुदाय से बहिष्कृत किए जाने का खतरा होता है. पीठ में शामिल जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि इस धार्मिक प्रथा की गहन जांच की आवश्यकता होगी, क्योंकि इसका पालन न करने पर न सिर्फ बहिष्कार झेलना पड़ सकता है, बल्कि यह व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक अखंडता और यौन स्वायत्तता पर भी प्रभाव डालता है. जस्टिस वराले ने कहा कि इस प्रथा का प्रभाव कई गुना है.

स्रोत: ABP Hindi

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