अफ़ग़ानिस्तान : 'आख़िरी सांस तक शादी का विरोध करूंगी'
तालिबान शासन के करीब पांच साल पूरे होने को हैं. इस बीच लड़कियों की ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई है. 12 साल से बड़ी लड़कियों के लिए स्कूल-कॉलेज बैन हैं. लंबी दूरी के सफर के लिए घर के पुरुष का साथ ज़रूरी हो गया है. नौकरी के विकल्प खत्म या सीमित हो चुके हैं. इतना ही नहीं, पार्कों में उनका जाना बैन है. ब्यूटी पार्लर तक बंद कर दिए गए हैं. ऐसे में अफ़गानिस्तान की औरतों को लगता है कि ज़िंदगी में जैसे एक ही विकल्प बचा हो, वह है- शादी. भले जीवन में कुछ कर गुज़रने की उम्मीदें टूट रही हों, मगर सपने साहस जुटा ही लेते हैं. बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें कुछ ऐसा ही हुआ 19 साल की आलिया (सुरक्षा के तहत बदला हुआ नाम) के साथ, जो शादी से बचने और पढ़ाई के लिए अपने गांव से सैकड़ों किलोमीटर दूर काबुल तक जा पहुंचीं. आलिया पिछले साल टैक्सी से अपनी चचेरी बहन के साथ एक असामान्य व जोखिम भरी यात्रा पर निकली थीं. उन्हें किसी भी वक्त तालिबान निरीक्षक पकड़ सकते थे क्योंकि वे बिना किसी पुरुष रिश्तेदार के लंबी दूरी तय कर रही थीं. हालांकि तालिबानी कानून के हिसाब से ही दोनों ने पूरा शरीर ढका था और सिर्फ आंखें दिखाई दे रही थीं. गनीमत रही कि किसी भी तालिबान चौकी पर उन्हें नहीं रोका गया और वे राजधानी काबुल तक पहुंच गईं. आलिया ने बताया, "मैंने अपने परिवार से बहाना बनाया कि मैं अपने दोस्तों और क्लासमेट से मिलने जा रही हूं मगर यह सच नहीं था. " अफ़ग़ानिस्तान के 34 प्रांतों में से एक दायकुंडी की रहने वाली आलिया ने यह भी कहा, "अगर मैं दायकुंडी में ही रहती तो मुझे शादी के लिए मजबूर किया जाता." वह काबुल में एक योजना के तहत आईं और यह थी- एक अंग्रेज़ी कोर्स में दाखिला लेना. इमेज स्रोत, AFP via Getty Images बीते करीब पांच साल से 12 बरस की उम्र से बड़ी लड़कियों के लिए प्राइमरी एजुकेशन के बाद औपचारिक शिक्षा के विकल्प नहीं हैं. वे अंग्रेजी सीखने जैसे शॉर्ट टर्म प्राइवेट कोर्ट में दाखिला तो ले सकती हैं, लेकिन तभी जबकि वे इसका ख़र्च उठा पाएं. इसके अलावा वे मदरसे में सीमित स्तर पर धार्मिक शिक्षा ले सकती हैं. इन वर्षों में आलिया जैसी लड़कियां बिना उस शिक्षा के बड़ी हुई हैं जिसकी उन्हें ज़रूरत थी. उनके लिए करियर का रास्ता लगभग बंद हो चुका है. आलिया कहती हैं, "जब मैं अपनी उम्र के आदमियों को देखती हूं जो पढ़ाई पूरी कर चुके हैं और यूनिवर्सिटी जा रहे हैं तो मुझे बहुत बुरा लगता है. मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं नर्क में जल रही हूँ." ऐसे में आलिया का अपनी पढ़ाई के लिए किसी तरह काबुल तक पहुंच जाना, खुद में साहस की एक कहानी तो है मगर इसमें उनका परिवार भी अहम रोल अदा कर रहा है. दरअसल, उनके परिवार की माली हालत दूसरे कई परिवारों से थोड़ा बेहतर है. दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक-अफ़ग़ानिस्तान में चार में से तीन लोग अपनी मूल ज़रूरतें पूरी कर पाने में सक्षम नहीं हैं. इमेज स्रोत, Mohsen KARIMI / AFP via Getty Images आलिया अपने परिवार के सहयोग के बारे में बताती हैं, "पढ़ाई पर लगे बैन से पहले मेरे माता-पिता स्कूल जाने को लेकर मेरा हौसला बढ़ाते थे. वे कहते थे कि मैं पायलट बनने का अपना सपना ज़रूर पूरा कर सकती हूं. उन्होंने काबुल में रहने के मेरे फैसले को स्वीकारा है और इंग्लिश कोर्स का ख़र्च उठा रहे हैं." वह यह भी कहती हैं कि "मेरे माता-पिता अफ़ग़ानिस्तान की वास्तविकताओं से बंधे हुए हैं. अब वे मेरे लिए शादी को सबसे बेहतर विकल्प मानते हैं क्योंकि न मैं स्कूल जा सकती हूं, न विश्वविद्यालय और न ही मैं काम ही कर सकती हूं." आलिया को शादी के कई प्रस्ताव मिल रहे हैं. उन्हें डर है कि उन्हें किसी एक पर हां कहना पड़ सकता है. पर वह डरती हैं कि शादी के बाद नए परिवार में उनकी आज़ादी छिन सकती है. वह कहती हैं कि कुछ परिवार बहुत सख्त होते हैं और उन्हें अपने सपनों को भूलने के लिए कह सकते हैं इसलिए वह इस बारे में पॉज़िटिव नहीं हो पातीं. पर उनके इरादे मज़बूत हैं. वह कहती हैं कि अगर उनका परिवार उन्हें मजबूर नहीं करता तो वे आख़िरी सांस तक शादी का विरोध करेंगी. इमेज स्रोत, BBC/Imogen Anderson वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं. हालांकि अफ़ग़ानिस्तान में शादी का विरोध करना आसान नहीं है. काबुल के पश्चिम में एक छोटे से घर में हमारी मुलाकात शमा (बदला हुआ नाम) से हुई, जो डॉक्टर बनना चाहती थीं मगर अब दो बच्चियों की मां हैं. उन्होंने बताया कि छह साल पहले उनके पिता की मौत हो गई, फिर उनकी मां ने सफ़ाईकर्मी की नौकरी की ताकि हम बहनें स्कूल जा सकें. लेकिन तालिबानी शासन में बैन लगने से उनकी पढ़ाई छूट गई. शमा की मां कामिला (बदला हुआ नाम) को अब लगता है कि उनके पास बेटियों की पढ़ाई का कोई विकल्प नहीं बचा है. वह कहती हैं, "मुझे डर है कि शादी लायक हो चुकी मेरी बेटी का घर नहीं बस पाया तो इससे परेशानियां खड़ी हो सकती हैं. मुझे डर है कि वे (तालिबान सरकार के सैनिक) मुझसे सवाल कर सकते हैं कि मैं उसकी शादी क्यों नहीं कर रही हूं." वह कहती हैं कि मैं चाहती थी कि मेरी बेटी पढ़-लिखकर काम करे और समाज में योगदान दे. मैं अनपढ़ हूं, यह नेत्रहीन होने जैसा है. मेरी बेटी (शमा) के बहुत से सपने थे पर अब मुझे नहीं लगता कि वे पूरे हो पाएंगे. शमा ने बताया, "अगर बैन नहीं लगा होता तो अब तक मैं स्कूलिंग पूरी कर चुकी होती और डॉक्टर बनने के करीब थी. यही मैं करना चाहती थी." मगर उनकी मां के दबाव में शमा की चार साल पहले शादी हो गई. अब उनके ऊपर दो छोटे बच्चों की जिम्मेदारी है जिसमें एक नवजात है. वह कहती हैं कि तालिबान शासन के आने से पहले उन्होंने अपने सपनों के लिए शादी के कई रिश्ते ठुकराए थे. वह कहती हैं कि जब फिल्मों में औरतों को पढ़ते हुए या काम करते हुए देखती हैं तो परेशान हो जाती हैं. हालांकि वह यह भी बताती हैं कि उनके पति का व्यवहार अच्छा है लेकिन उन्हें अपने सपनों को पूरा न कर पाने का दुख हमेशा रहता है. वह खुद को घर में बंद महसूस करती हैं और ऐसा लगता है कि वह सिर्फ अपने बच्चों के लिए जी रही हैं. इमेज स्रोत, Wakil KOHSAR / AFP via Getty Images शमा की छोटी बहन नोरा (बदला हुआ नाम) 18 साल की हैं. उन्हें डर है कि उनका भी यही हाल होगा. वह कहती हैं, "मैं शादी के लिए अभी काफी छोटी हूं और पढ़ाई जारी रखना चाहती हूं. ऐसा लगता है कि जैसे मैं जेल में क़ैद हूं. लेकिन बाहर जाने से डर लगता है और घर में मां शादी के लिए दबाव डालती हैं." लड़कियों की पढ़ाई पर लगे बैन को लेकर वह कहती हैं, "मुझे नहीं लगता कि तालिबान सरकार में कभी दोबारा स्कूल खुलेंगे. मैं चार साल से ज्यादा वक्त से उस एलान का इंतजार कर रही हूं कि स्कूल खुलेंगे." दूसरी ओर, काबुल पढ़ने आ गईं आलिया उस पल के बारे में बताती हैं जब तालिबान सरकार ने पढ़ाई पर बैन लगाया था. वह पल उनके जैसी कई महिलाओं के ज़हन में एकदम ताज़ा है. आलिया बताती हैं, "मैं उस पूरे दिन और पूरी रात सिर्फ रोयी थी. मैं एक हफ्ते तक सो नहीं पाई, मुझे ऐसा लगा जैसे मैं जिंदा लाश की तरह इधर-उधर भटक रही हूं." बता दें कि तालिबान के सर्वोच्च नेता द्वारा लगाए गए कई और प्रतिबंधों का महिलाओं को सामना करना पड़ रहा है. कुछ जगहों पर ये काफी सख्ती से लागू हैं, जबकि कुछ जगह पर थोड़ी रियायत है. इमेज स्रोत, Wakil KOHSAR / AFP) (Photo by WAKIL KOHSAR/AFP via Getty Images 2021 से तालिबान सरकार इस सवाल का स्पष्ट जवाब नहीं दे पाई है कि लड़कियों के लिए स्कूल कब खुलेंगे? सत्ता संभालने के बाद सितंबर, 2021 में तालिबान के एक प्रवक्ता ने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में बताया था कि लड़कियों के लिए स्कूल खुलेंगे. साथ ही कहा था कि वे "सुरक्षा स्थिति को सुधारने पर काम कर रहे हैं." फिर एक साल बाद यानी 2022 में तालिबान सरकार ने जवाब दिया कि "धार्मिक विद्वानों को लड़कियों के स्कूल आने-जाने की सुरक्षा को लेकर चिंता है." साथ ही कहा कि वे इस समस्या पर काम कर रहे हैं. साल 2024 में तालिबान सरकार के उप-प्रवक्ता हमदुल्लाह फ़ित्रत ने कहा कि "हम नेतृत्व के फ़ैसले का इंतजार कर रहे हैं." इसी महीने हम दोबारा सरकार के प्रवक्ता फ़ित्रत से मिले तो वे महिला होने के नाते हमारे साथ तस्वीर खिंचवाना या महिला के सामने बैठकर बात करना नहीं चाहते थे. तब उनसे पूछा गया, वे माध्यमिक स्कूल और विश्वविद्यालय में लड़कियों की शिक्षा के ऊपर लगे प्रतिबंध को कैसे सही ठहरा सकते हैं? इसके जवाब में उन्होंने कहा, "करीब सात मिलियन लड़के और पाँच मिलियन लड़कियां इस समय पढ़ाई कर रहे हैं. और छठी कक्षा के बाद की शिक्षा पर प्रतिबंध एक अलग मुद्दा है." फिर प्रवक्ता ने बीबीसी को संतोषजनक जवाब के लिए शिक्षा मंत्रालय के पास जाने को कहा. इसके बाद बीबीसी ने दोबारा प्रवक्ता से पूछा, "अफ़ग़ानिस्तान की महिलाएं सोचती हैं कि उनके लिए शिक्षा के मौके दोबारा कभी नहीं खुलेंगे, शायद यह प्रतिबंध नहीं हटेगा" इसका जवाब भी उन्होंने शिक्षा मंत्रालय से ही लेने का अनुरोध किया. फिर बीबीसी ने शिक्षा मंत्रालय से भी वही सवाल किए लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं आया. कई मौकों पर यह स्पष्ट हुआ है कि तालिबान सरकार के बीच महिलाओं की शिक्षा को लेकर मतभेद हैं. पर बीते पांच साल में सुप्रीम लीडर का रुख इस मुद्दे पर और ज्यादा कड़ा ही हुआ है. (इस रिपोर्ट में इमोजेन एंडरसन, महफ़ूज़ जुबैर और संजय गांगुली ने भी योगदान दिया है.) बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
स्रोत: BBC Hindi