पूर्ण संस्करण देखें
⚡ AMP पेज | पूर्ण वेबसाइट देखें
Death

सीबीएसई का नया सिस्टम क्या स्टूडेंट्स का सिरदर्द बढ़ा रहा है?

✍️ Admin 📅 29 May, 2026 ⏰ 05:14 PM 👁 41 views

इमेज स्रोत, Santosh Verma/Bloomberg via Getty Images सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) के नए ऑन स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) सिस्टम पर स्टूडेंट्स, अभिभावक और विपक्षी दल सवाल उठा रहे हैं. ऐसा दावा किया जा रहा था कि इस सिस्टम को परीक्षा में जांच को सटीक और तेज़ बनाने के लिए लाया गया है, लेकिन यही अब सवालों के घेरे में आ गया है. 12वीं कक्षा के बहुत से स्टूडेंट धुंधली आंसर शीट, पोर्टल क्रैश और यहां तक कि आंसर शीट्स बदलने की शिकायत कर रहे हैं. मुद्दा इतना तूल पकड़ चुका कि सीबीएसई के 12वीं बोर्ड परीक्षा में बैठे हर चार में से करीब एक छात्र ने अपनी जांची हुई आंसर शीट की स्कैन कॉपी मांगी है. बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें सीबीएसई के 26 मई 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक परीक्षा में शामिल 17 लाख 68 हजार 968 छात्रों में से 4 लाख 4 हजार 319 छात्रों ने स्कैन कॉपी के लिए आवेदन किया, जो कुल का करीब 23 फीसदी है. बीबीसी ने यह समझने की कोशिश की कि स्टूडेंट्स किस-किस तरह की समस्याएं झेल रहे हैं. विद्यार्थी, वकील और सीबीएसई से जुड़े एक टीचर से बातचीत में 5 सवाल सामने आए, जिनके जवाब लाखों स्टूडेंट्स समेत अभिभावक चाहते हैं. वो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख़बरें जो दिनभर सुर्खियां बनीं. 13 मई को सीबीएसई के 12वीं कक्षा के नतीजे आए. पिछले साल के मुकाबले इस साल करीब 3 फीसदी कम स्टूडेंट पास हुए. रिजल्ट जारी होते ही सीबीएसई के नए मूल्यांकन सिस्टम ओएसएम (ऑन स्क्रीन मार्किंग) पर सवाल उठने लगे, जिससे डिज़िटल तरीके से मूल्यांकनकर्ताओं ने आंसर कॉपी जांची थीं. पहले का तरीक़ा यह था कि परीक्षा के बाद छात्रों की आंसर कॉपियां बंडल बनाकर टीचरों के पास भेजी जाती थीं. टीचर उन्हें हाथ में लेकर लाल पेन से जांचते थे, नंबर जोड़ते थे और साइन करते थे. अब सीबीएसई ने नया तरीक़ा अपनाया है. पहले सभी कॉपियां स्कैन होती हैं यानी उनकी डिज़िटल फ़ोटो खींची जाती है. फिर यह फ़ोटो ऑनलाइन सिस्टम पर अपलोड हो जाती है. टीचर अब असली कॉपी की जगह कंप्यूटर या लैपटॉप की स्क्रीन पर वही कॉपी देखकर नंबर देते हैं, बिल्कुल वैसे जैसे हम फ़ोन पर किसी डॉक्युमेंट की पीडीएफ़ पढ़ते हैं. विवाद बढ़ने पर 15 मई को सीबीएसई ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इस नए ओएसएम सिस्टम का बचाव किया था. साथ ही बताया था कि उसने बड़े स्तर पर इस सिस्टम के लिए तैयारी की थी और जहां ज़रूरत लगी, कॉपियों की रीस्कैनिंग और मैनुअल चेकिंग भी कराई थी. सीबीएसई का कहना था कि उसने 100 टीचरों से कॉपी चेक कराकर ड्राईरन भी कराया था. बोर्ड के मुताबिक़, सभी ख़ामियां ठीक कराने के बाद ही उसने ओएसएम प्रणाली से कॉपी चेक कराई. लेकिन इसके आगे के घटनाक्रम लगातार विवाद बढ़ाते चले गए. इसी बीच एक छात्र वेदांत श्रीवास्तव ने सोशल मीडिया पर दावा किया था कि बोर्ड ने उन्हें एक विषय की ग़लत आंसर शीट भेजी है. मामला तब और बढ़ गया जब उन्हें दूसरे देश का बताकर ट्रोल किया गया. सीबीएसई ने वेदांत के केस में हुई तकनीकी समस्या को हल कर दिया, लेकिन नए असेसमेंट सिस्टम यानी ओएसएम पर लगातार सवाल उठने लगे. इस पर 24 मई को सीबीएसई ने तकनीकी ख़ामियों की बात स्वीकारी और किसी भी संभावित समस्या की जांच एक्सपर्ट से कराने की बात कही. फ़िलहाल स्थिति ये है कि परीक्षा में बैठे लगभग 18 लाख विद्यार्थियों में से 4 लाख से कुछ ज़्यादा ने आंसर शीट की स्कैन्ड कॉपी की मांग की है. ध्यान रहे कि पुराने बंदोबस्त में मैनुअल चेकिंग होती थी. इमेज स्रोत, Mayank Makhija/NurPhoto via Getty Images सीबीएसई ने ओएसएम सिस्टम को लेकर कहा कि इससे जांच की प्रक्रिया ज़्यादा तेज़ और सटीक हो सकेगी. साथ ही मैनुअल ग़लतियां कम से कम रहेंगी, लेकिन अब इस दावे पर सवाल उठ रहे हैं. ओएसएम प्रणाली से कॉपी जांचने वाले परीक्षकों की ट्रेनिंग पर सवाल उठ रहे हैं. नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से सीबीएसई बोर्ड से संबद्ध एक स्कूल की शिक्षिका कहती हैं, "पहले टीचर ऑफ़लाइन में भी गड़बड़ियां करते थे. कभी टोटलिंग में नंबर छूट जाते थे, तो कभी सही जवाब को ग़लत मार्क कर दिया जाता था. इन सबसे बचने के लिए ऑन स्क्रीन का कांसेप्ट लाया गया." वे कहती हैं, "एग्जाम ऑफ़लाइन लिया जा रहा है और जांच ऑनलाइन हो रही है. इस प्रक्रिया के लिए परीक्षकों को लंबी ट्रेनिंग मिलनी चाहिए थी, लेकिन बोर्ड ने मान लिया कि टीचर तकनीक समझते ही होंगे. काफी सतही प्रशिक्षण के बाद सिस्टम लागू हो गया." वहीं एनडीटीवी से बात करते हुए शिक्षाविद डॉ. एसके दत्ता ने कहा कि कुछ शिक्षक ऑनलाइन तकनीक में माहिर हैं तो कुछ को अभी और प्रशिक्षण की जरूरत है और यह सच्चाई है. सीबीएसई को सुझाव देते हुए उन्होंने कहा कि फ़िलहाल ऑनलाइन और ऑफ़लाइन दोनों विकल्प एक साथ क़रीब एक साल तक चलाए जाएं और छात्रों को चुनने की आज़ादी दी जाए. उनके अनुसार, जब तक शिक्षकों में इस तकनीक को लेकर पूरी परिपक्वता न आ जाए, तब तक पूरी तरह ऑनलाइन सिस्टम पर न जाएं. हालांकि इस मामले में सीबीएसई बता चुका है कि आंसर शीट जांचकर्ताओं को प्रक्रिया समझने में मदद करने के लिए मॉक इवेलुएशन करने का मौक़ा दिया गया था. जैसे किसी बड़े मैच से पहले टीम प्रैक्टिस मैच खेलती है, वैसे ही मॉक इवेलुएशन में परीक्षकों को असली कॉपियां जांचने से पहले नकली या पुरानी आंसर शीट दी जाती हैं. इसका मकसद यह होता है कि जांचकर्ता नए सिस्टम को समझ सकें और ग़लतियां असली रिजल्ट में न हों. सीबीएसई का कहना है कि उसने फ़रवरी में यही किया था, ताकि टीचर ओएसएम यानी ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम पर हाथ आज़मा सकें. इमेज स्रोत, Dibyangshu SARKAR / AFP via Getty Images 12वीं बोर्ड की कॉपी जांचने के लिए ओएसएम प्रणाली का ठेका हैदराबाद की एक कंपनी 'कोएम्प्ट एडुटेक' को दिया गया. लेकिन इसके लिए हुए ऑडिट और टेस्टिंग जैसी बातों को लेकर पब्लिक डोमेन में सीमित जानकारी है. इसे लेकर नेता विपक्ष राहुल गांधी आरोप लगा रहे हैं कि कंपनी पहले अलग नाम से तेलंगाना में काम करती थी. उनका आरोप है कि साल 2019 और 2023 में बोर्ड परीक्षा से जुड़े विवादों में इस कंपनी का नाम आ चुका है. एनडीटीवी से बात करते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने राहुल गांधी के आरोपों का जवाब दिया. उन्होंने कहा, "राहुल गांधी कह रहे हैं, जिनकी कर्नाटक और तेलंगाना की सरकारों ने उसी कंपनी को काम पर लगाया. तो क्या राहुल गांधी दिल्ली के लिए अलग मानक रखेंगे और कर्नाटक-तेलंगाना के लिए अलग?" "इसके अलावा उसकी चयन प्रक्रिया पर भी कुछ सवाल उठे हैं. भारत सरकार के नीति-नियमों के तहत सेंट्रलाइज्ड प्रोक्योरमेंट पोर्टल के जरिए इसे लगाया गया था. कंपनी की क्षमता पर भी सवाल आ रहे हैं, इसलिए हमने एक समिति बनाई है जो उसकी तकनीक और प्रक्रिया का मूल्यांकन करेगी." उन्होंने कहा, "प्रक्रिया का उल्लंघन करने का किसी को भी अधिकार नहीं है और जो भी दोषी होगा उसे जवाबदेही लेनी होगी." मामला तूल पकड़ने पर सीबीएसई ने आधिकारिक बयान दिया कि एजेंसी को अनुबंध देने के दौरान सभी नियमों का पालन किया गया. बयान के साथ ही बोर्ड ने टेंडर प्रोसेस का डेटा भी सार्वजनिक किया. इमेज स्रोत, Biplov Bhuyan/Hindustan Times via Getty Images नीट से लेकर कई परीक्षाओं में पेपर लीक और तरह-तरह की गड़बड़ियों के आरोपों ने क्या अभिभावकों समेत विद्यार्थियों का भरोसा कमजोर किया है? बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने इस मुद्दे पर वेदांत श्रीवास्तव के बड़े भाई सिद्धांत श्रीवास्तव से संपर्क किया. वे आंसर शीट की गड़बड़ी का मुद्दा उठाकर वायरल हो गए थे. सिद्धांत कहते हैं, "नंबर कम होने पर हमने भाई की स्कैन कॉपी मंगाई, जो धुंधली दिख रही थी. गौर से देखने पर समझ आया कि हैंडराइटिंग वेदांत की है ही नहीं." "तब हमने सोशल मीडिया का सहारा लिया था. तब से हमारे पास बहुत से बच्चों के मेल आ रहे हैं कि उन्हें भी ऐसा शक है कि उनके मार्क्स कम हुए हैं या पेपर की अदला-बदली हुई है." सिद्धांत कहते हैं, "ये समय बहुत क्रूशियल है. इस समय स्टूडेंट कॉलेज में एडमिशन की तैयारी या किसी दूसरी परीक्षा में लगे होते हैं. ऐसे में उन्हें यह डर है कि उनके मार्क्स सही मिले भी हैं या नहीं. वे लगातार स्कैन कॉपी और री-इवैल्यूएशन के लिए आवेदन कर रहे हैं." बोर्ड से चार लाख से ज्यादा स्टूडेंट्स ने अपनी स्कैन आंसर कॉपी की मांग की है, जिसे नए सिस्टम से जोड़ा जा रहा है. बीबीसी से बातचीत में दिल्ली में रहने वाली 12वीं की छात्रा धृति अग्रवाल कहती हैं, "11वीं में मैंने इकॉनॉमिक्स में पूरे स्कूल में टॉप किया था. प्री बोर्ड में भी बहुत हाई स्कोर किया था, लेकिन बोर्ड में कम नंबर मिले." उन्होंने कहा, "मैंने स्कैन कॉपी मांगी तो पता लगा कि मल्टीपल चॉइस क्वेश्चन के अलावा हर सही सवाल पर आधा-आधा नंबर काटा गया है. इससे बड़ा फर्क आ रहा है. ये कट-ऑफ़ में काफ़ी मायने रखेगा." वे कहती हैं कि अगर अब मुझे ये नंबर चाहिए तो हर सवाल के लिए 25 रुपए सबमिट करने होंगे. बता दें कि सीबीएसई ने हर सवाल के उत्तर के दोबारा मूल्यांकन के लिए चार्ज की जाने वाली फ़ीस को 100 रुपए से घटाकर 25 रुपये कर दिया है. सीबीएसई की ओर से प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया गया था कि उसने रिजल्ट जारी करने से पहले करीब 13 हज़ार कॉपियों की मैनुअल चेकिंग करायी थी, क्योंकि स्कैनिंग और री-स्कैनिंग के दौरान ये धुंधली पाई गई थीं और इन्हें डिज़िटली जांचना पर्याप्त नहीं था. चूंकि सीबीएसई की ओर से आवेदक विद्यार्थियों को जो स्कैन आंसर कॉपियां मिल रही हैं, उनमें भी बड़ी तादाद पर स्कैनिंग या ब्लर दिखने की समस्या देखने को मिल रही है. ऐसे में क्या और अधिक कॉपियों की मैनुअल जांच नहीं की जानी चाहिए थी? बीबीसी से बात करने वाले स्टूडेंट्स ने चिंता ज़ाहिर की है कि स्कैन की गई आंसर शीट के कई पन्ने ब्लर मिल रहे हैं. ऐसे में वे किस तरह इनपर लिखे जवाबों के पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन कर पाएंगे? साथ ही, कई विद्यार्थियों की चिंता इस बात को लेकर भी है कि दोबारा कॉपी की चेकिंग भी ओएसएम से ही होनी है, कहीं दोबारा वे उसी समस्या का सामना न करें जो पहले थी. इन स्टूडेंट्स का कहना है कि नए सिस्टम के कारण 12वीं के बाद अच्छी यूनिवर्सिटी में एडमिशन चाह रहे छात्र एक या दो नंबर से कट-ऑफ़ से चूक सकते हैं. यानी मामूली फ़र्क भी उनके भविष्य पर असर डाल सकता है. यह बात भी उठ रही है कि जब मैनुअल जांच पर ही भरोसा करना है तो नया असेसमेंट लागू ही क्यों हुआ? इमेज स्रोत, Photo by Sneha Srivastava/Mint via Getty Images सीबीएसई की निगरानी करने वाले शिक्षा मंत्रालय और शिक्षा मंत्री ने 13 मई को रिजल्ट आने के बाद काफ़ी समय तक ओएसएम विवाद पर चुप्पी साधे रखी. यह मंत्रालय इस विवाद के शुरू होने से पहले नीट परीक्षा में लीक के दावों से घिरा हुआ था. हालांकि 28 मई को सीबीएसई के साथ एक अहम बैठक के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस पर बयान देकर ओएसएम गड़बड़ियों पर जिम्मेदारी ली है. उन्होंने कहा, "यह पहली बार था जब सीबीएसई ओएसएम का उपयोग कर रहा था. यह छात्र-केंद्रित और वैश्विक रूप से मान्यता प्राप्त प्रणाली है." उन्होंने यह भी कहा, "परिणामों में कुछ त्रुटियां सामने आई हैं, मैं इसकी ज़िम्मेदारी लेता हूँ और आपको आश्वस्त करता हूँ कि इसका समाधान निकाला जाएगा. हम इस पर काम कर रहे हैं. हम किसी भी छात्र के सवाल को अनदेखा नहीं छोड़ेंगे." इससे पहले री-इवेलुएशन के लिए सीबीएसई के रिक्वेस्ट पोर्टल पर स्टूडेंट्स लॉगिन फ़ेल होने व पेमेंट गेटवे में गड़बड़ी की समस्याओं का सामना कर रहे थे. तब शिक्षा मंत्रालय ने एक बयान जारी करके बताया था कि ख़ामियां सुधरवाने के लिए आईआईटी कानपुर व मद्रास के विशेषज्ञ टीम को सीबीएसई की मदद के लिए भेजा गया है. हालांकि तब भी शिक्षा मंत्रालय ने अभिभावकों व विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कोई बयान नहीं दिया. इसके बाद 27 मई को राहुल गांधी ने ओएसएम से जुड़ी अनियमितता का मामला उठाया तो 28 मई को शिक्षा मंत्री ने उनके दावे पर प्रतिक्रिया दी. साथ ही उन्होंने कहा कि ओएसएम को लेकर सीबीएसई अपना पक्ष रख चुकी है. असल में तकनीकी गड़बड़ी के तार सीधे-सीधे छात्रों के भविष्य से जुड़े हैं. स्कैन कॉपी मिलने के बाद री-इवैल्यूएशन होगा, तब कहीं जाकर सही स्थिति पता लगेगी. इतने में समय बीत सकता है, जबकि कई कॉलेजों में काउंसलिंग शुरू होने जा रही है. नंबरों के अंतर से कॉलेज के चयन पर भी असर होगा. इस बारे में बात करते हुए 12वीं की छात्रा स्तुति राव कहती हैं, "मैंने 22 मई को एक विषय की स्कैन कॉपी के लिए आवेदन किया. पहले तो वेबसाइट ही खुल नहीं रही थी." "देर रात वेबसाइट खुली, तो कॉपी के लिए आवेदन कर दिया, लेकिन आज तक कॉपी नहीं मिली है. बता दें कि बीबीसी से स्तुति की बातचीत 27 मई को हो रही थी." स्तुति कहती हैं, "इंतजार में टाइमलाइन आगे सरक रही है. इसका असर कॉलेज सलेक्शन से लेकर एडमिशन तक पर हो सकता है." ओएसएम प्रोसेस विवादों में है. सोशल मीडिया पर बहुत से छात्र अनियमितता के आरोप लगा रहे हैं. यहां तक कि वे क़ानूनी मदद भी ले रहे हैं. छात्रों को लीगल एड दे रहे दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के वकील विनीत जिंदल से बीबीसी ने बातचीत की, जिनके मुताबिक़ बच्चों की पांच शिकायतें हैं- विनीत जिंदल के अनुसार, वे सीबीएसई को लीगल नोटिस दे चुके हैं कि वो जल्द से जल्द बच्चों की सही आंसर शीट खोजकर उन्हें मुहैया कराए. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

स्रोत: BBC Hindi

📤 शेयर करें: