अमेरिका और इसराइल की हवा से ज़मीन पर जंग जारी है. इस बीच, ईरान में निशाना लगाकर हमले किए जा रहे हैं. लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि क्या ज़मीन पर भी सैनिक उतर सकते हैं? मुमकिन है. लेकिन ये अमेरिकी सैनिक नहीं हो सकते. उत्तरी इराक़ में निर्वासन में रह रहे ईरानी कुर्द विपक्षी समूहों ने बीबीसी को बताया कि उनके पास सीमा पार करने की योजनाएं हैं. ये योजनाएं दशकों पुरानी हैं. लेकिन वे इस बात को साफ़ नकारते हैं कि उनके लड़ाके पहले ही सीमा पार कर चुके हैं. कुर्दिस्तान फ़्रीडम पार्टी (पीएके) की हना यज़दानपाना का दावा है कि उनके समूह के पास सबसे बड़ा सशस्त्र बल है. वह कहती हैं, "हम पिछले 47 साल से, इस्लामिक रिपब्लिक के दौर से ही इसके लिए तैयारी कर रहे हैं." लेकिन वह ज़ोर देकर कहती हैं कि "एक भी पेशमर्गा ने अभी तक क़दम नहीं बढ़ाया है." कुर्दिश शब्द पेशमर्गा का अर्थ होता है- 'जो मौत का सामना करते हैं.' बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें यज़दानपाना ने हमें बताया कि छह विपक्षी समूह, जिन्होंने हाल ही में एक गठबंधन बनाया है, राजनीतिक और सैन्य स्तर पर आपस में तालमेल बना रहे हैं. वह कहती हैं, "कोई भी अकेले नहीं चलता. अगर हमारे भाई आगे बढ़ने वाले होंगे, हमें पता चल जाएगा." उन्हें नहीं लगता कि लड़ाकों की कोई गतिविधि इस हफ़्ते होगी. सबसे पहले, अमेरिका को रास्ता साफ़ करना होगा. वह कहती हैं, "हम तब तक नहीं बढ़ सकते जब तक हमारे ऊपर का आसमान साफ़ न हो. और हमारी ज़रूरत यह है कि शासन के हथियारों के गोदाम पहले नष्ट किए जाएं. वरना यह आत्मघाती क़दम होगा. शासन (ईरानी) बहुत क्रूर है, और हमारे पास सबसे एडवांस हथियार सिर्फ़ एक कलाश्निकोव है." वह चाहती हैं कि अमेरिका कुर्द लड़ाकों की सुरक्षा के लिए नो-फ़्लाई ज़ोन लागू करे. वह कहती हैं, "हम कई बार यह मांग कर चुके हैं." "ईमेल भेजकर मैंने ही लिखा था कि 'हमें इसकी तुरंत ज़रूरत है'." इमेज स्रोत, Matthew Goddard/BBC मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ. व्हाइट हाउस ने उस रिपोर्ट से इनकार किया है जिसमें कहा गया था कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कुर्द लड़ाकों को हथियार देने पर विचार कर रहे थे. हालांकि इनमें से कइयों को पहले अमेरिका ने ही इराक़ में इस्लामिक स्टेट (आईएस) के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए ट्रेनिंग दी थी. लेकिन जैसे-जैसे ईरानी कुर्द लड़ाकों के आगे बढ़ने की चर्चाएं बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे उन पर ईरान के हमले भी तेज़ हो गए हैं. हमने दो अलग-अलग समूहों पर हुए हमलों के बाद का मंज़र देखा, जिनमें से एक बैलिस्टिक मिसाइल हमला था जिसने पीएके के एक बेस को तबाह कर दिया, और उसमें एक लड़ाके की मौत हो गई. कुछ समूहों ने अपने बेस ख़ाली कर दिए हैं और अपने लड़ाकों को दूसरी जगह ले जाकर हमलों से बचाने की कोशिश कर रहे हैं. ईरानी शासन के ख़िलाफ़ लड़ाई में कूदना बहुत बड़ा जोखिम होगा और यह साफ़ नहीं है कि ट्रंप इसके बदले उन्हें क्या देने वाले हैं. कुर्द मध्य पूर्व का चौथा सबसे बड़ा जातीय समूह हैं. ईरान, इराक़, सीरिया और तुर्की में बिखरे हुए हैं. उनका इतिहास लंबा है, जिसमें लगातार उनका उत्पीड़न किया गया है और धोखा दिया गया है. एक पुरानी कुर्द कहावत है, 'हमारा कोई दोस्त नहीं, सिवाय पहाड़ों के'. क्या अमेरिका पर भरोसा किया जा सकता है कि वह जो भी वादा करे, उसे निभाएगा? हाल ही में सीरिया के कई कुर्द, जो आईएस के ख़िलाफ़ लड़ाई में अमेरिका के मज़बूत सहयोगी रहे हैं, तब नाराज़ हो गए जब ट्रंप ने दमिश्क की अंतरिम सरकार का साथ दिया और उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया. फिर भी, कुछ वरिष्ठ ईरानी कुर्द नेता व्यावहारिक नज़रिया रखते हैं. कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ ईरान (केडीपीआई) के उपाध्यक्ष मुस्तफ़ा माउलूदी कहते हैं, "अमेरिका और इसराइल ने यह युद्ध हमारी उम्मीदों के लिए नहीं, बल्कि अपने हितों के लिए शुरू किया है." "लेकिन वे इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) के ठिकानों को निशाना बना रहे हैं और यह हमारे लिए अच्छा है, इससे हमें अंदर जाने में मदद मिलेगी." इमेज स्रोत, Matthew Goddard/BBC 67 साल की उम्र में, वह लगभग अपनी ज़्यादातर ज़िंदगी इस उम्मीद में गुज़ार चुके हैं कि इस्लामी शासन का पतन होगा. पारंपरिक कुर्द पोशाक पहनकर, वह हमें अपने दर्द भरे पारिवारिक इतिहास के बारे में बताते हैं. उनके एक चचेरे भाई को सिर्फ़ 13 साल की उम्र में शासन ने मार दिया था और दूसरा विपक्ष की मदद करने के शक में पिछले 31 साल से जेल में है. उनका कहना है कि उनकी राजनीतिक गतिविधियों की वजह से उनके परिवार के लगभग 60% लोगों को गिरफ़्तार किया गया और बुरा बर्ताव सहना पड़ा. माउलूदी के मन में पहले से यह छवि बनी हुई है कि अपनी ज़मीन पर लौटते ही वह क्या करेंगे. वह कहते हैं, "जब मैं पहले गांव पहुंचूंगा, तो ज़ोर से कहूंगा: 'मैं तुम्हारे लिए लड़ता रहा हूं, तुम मेरे लोग हो, और अब मैं और भी लड़ूंगा'." उन्हें विश्वास है कि वह 21 मार्च को पड़ने वाले कुर्दिश नए साल, नौरूज़, के समय तक वहां पहुंच चुके होंगे. ईरान की 9 करोड़ की आबादी में कुर्द क़रीब 10% हैं. यहां उनके नेता अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील कर रहे हैं कि वह ट्रंप का साथ दें और उनका भी साथ दें. ईरानी कुर्दिस्तान की कोमाला पार्टी के महासचिव अब्दुल्ला मोहतादी कहते हैं, "हम ईरान में सबसे संगठित राजनीतिक समूह हैं और हम इस मौके़ को (परिवर्तन के लिए) हाथ से नहीं जाने देंगे." वह ब्रिटेन के रुख़ से निराश हैं. मोहतादी कहते हैं, "मुझे हैरानी है कि यूरोप में ब्रिटेन ही एकमात्र देश है जिसने आईआरजीसी को आतंकवादी संगठन घोषित नहीं किया है." वह अमेरिका को अपने ठिकानों से ईरान पर हमला करने की अनुमति देने पर 'हिचकने' के लिए भी ब्रिटेन की आलोचना करते हैं. इमेज स्रोत, Matthew Goddard/BBC यह कहना मुश्किल है कि कुर्द कितने लड़ाके जुटा पाएंगे. एक स्थानीय पत्रकार के अनुसार, जो खुद भी कुर्द हैं, "संख्या शायद कई हज़ार हो सकती है, जिनमें से कुछ पहले ही अंदर मौजूद होंगे." वह कहते हैं, "वे ईरान में आने वाले बदलाव का हिस्सा बनना चाहते हैं ताकि भविष्य में उनकी भी हिस्सेदारी हो. इतिहास से मिले सबक के बावजूद, वे उम्मीद बनाए हुए हैं." कुछ ईरानी कुर्दों का कहना है कि अब कदम उठाने का समय आ गया है, चाहे अमेरिका वादे निभाए या नहीं. ईरान की सीमा के पास बसे शहर सुलैमानिया की एक महिला कहती हैं, "अगर हमें अपने वतन की एक झलक देखने की ज़रा-सी उम्मीद भी मिल जाए, तो वही हमारे लिए काफ़ी है." वह आगे कहती हैं, "हम इसे (ईरान को) जल्लादों का इस्लामी शासन कहते हैं. हमें उनसे बेहद नफ़रत है. उन्होंने इतने ज़्यादा लोगों को मार डाला है." इस सबने इराक़ को बड़ी मुश्किल स्थिति में डाल दिया है, क्योंकि उसके पड़ोस में चल रही जंग में घसीटे जाने का डर बना हुआ है. इराक़ की सरकार ने कह दिया है कि वह किसी भी समूह को "इराक़ी जमीन से ईरानी सीमा पार कर आतंकवादी गतिविधियां करने" की अनुमति नहीं देगी. अगर कुर्द लड़ाके सीमा पार करते हैं, तो पीएके की हना यज़दानपाना के लिए यह पल खट्टी-मीठी भावनाओं से भरा होगा. वह कहती हैं, "अपने देश वापस जाना मेरे लिए बहुत भावुक पल होगा." "मेरे चाचा और दादा-दादी यहीं (उत्तरी इराक़) मरे थे. मुझे समझ नहीं आता कि क्या महसूस करूं... खुश होऊं या दुखी, क्योंकि जो सच में इस दिन को देखने के हक़दार थे, अब नहीं रहे." अतिरिक्त रिपोर्टिंग- वीट्स्के बुरेमा, मैथ्यू गोडार्ड और बिज़हार शरीफ़ बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. (बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
स्रोत: BBC Hindi