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पश्चिम बंगाल में 60 लाख मतदाताओं की किस्मत अधर में, सप्लीमेंट्री लिस्ट ने बढ़ाई चिंता

पश्चिम बंगाल के मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति बनी हुई है क्योंकि यह साफ़ नहीं है कि 'अंडर एडज्यूडिकेशन' के तहत चिह्नित कितने मतदाताओं के नाम सोमवार आधी रात से कुछ मिनट पहले भारत के चुनाव आयोग की पूरक मतदाता सूची से हटाए गए हैं. राज्य में महीने भर बाद चुनाव हैं. पश्चिम बंगाल देश के उन कुछ राज्यों में शामिल है जहां ग़ैर भाजपा सरकार है. पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद, लगभग 60 लाख नामों को मतदाता के रूप में उनकी पात्रता की जांच के लिए अलग रखा गया है. ये राज्य के कुल मतदाताओं का लगभग 8.5% हिस्सा हैं. मतदाता सूची में इन्हें 'अंडर एडज्यूडिकेशन' के रूप में चिह्नित किया गया था. बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें सोमवार देर रात, भारत के चुनाव आयोग ने पहली सूची जारी की, जिसमें उन मतदाताओं के नाम शामिल थे जिन्हें अंतिम मतदाता सूची में जोड़ा गया है और जिन्हें सूची से हटाया गया है. हालांकि, मंगलवार दोपहर तक यह जानकारी नहीं दी गई है कि उन 60 लाख 'संदिग्ध और लंबित' मामलों में से कितनों का निपटारा हुआ और कितने लोगों ने अपने मतदान का अधिकार खो दिया. पूरक सूची जारी होने से कुछ घंटे पहले सोमवार दोपहर को पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल ने कहा था, "आज की स्थिति में, हमारे डैशबोर्ड के अनुसार लगभग 29 लाख मामलों का निपटारा हो चुका है. कितने मामलों पर ई-साइन होगा, यह साफ़ नहीं है. आज हमें जितने ई-साइन मामले मिलेंगे, उन्हें आज की पूरक सूची में प्रकाशित किया जाएगा." इसके अलावा, सोमवार तक 'अंडर एडज्यूडिकेशन' मामलों का केवल आंशिक निपटारा हुआ था, इसलिए कई मतदान केंद्रों के लिए कोई डेटा ऑनलाइन दिखाई नहीं दे रहा है. इससे पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों से एक महीने पहले मतदाताओं के बीच और भ्रम और चिंता बढ़ गई है. जिन मतदाताओं के नाम 'अंडर एडज्यूडिकेशन' के रूप में चिह्नित हैं, वे चुनाव आयोग के इस लिंक पर क्लिक करके मतदान केंद्र के अनुसार पूरक सूची डाउनलोड कर सकते हैं. इसके अलावा, मतदाता वेबसाइट पर अपलोड की गई डिलीट किए नामों की सूची में भी अपना नाम देख सकते हैं. किसी 'अंडर एडज्यूडिकेशन' मामले के निपटारे का मतलब है कि उस मतदाता की सत्यापन प्रक्रिया पूरी हो गई है और यह तय किया गया है कि वह मतदान के योग्य है या नहीं. इसलिए, निपटाया गया मामला या तो योग्य मतदाताओं की पूरक सूची में जोड़ा गया होगा या हटाए गए या अयोग्य मतदाताओं की सूची में शामिल किया गया होगा. चुनाव आयोग के अनुसार, निपटारा होने का मतलब यह नहीं है कि नाम मतदाता सूची में जोड़ा ही जाएगा. मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ. पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण पिछले साल 27 अक्तूबर को शुरू हुआ था. इस वर्ष 28 फ़रवरी को 'अंतिम' मतदाता सूची के प्रकाशन के साथ यह पूरा हुआ था. इसमें कथित रूप से मृत, डुप्लीकेट, अनुपस्थित, स्थानांतरित या अयोग्य मतदाताओं को हटाया गया है. इस प्रक्रिया में, चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, राज्य के मतदाताओं की संख्या लगभग 7.66 करोड़ से घटकर लगभग 6.44 करोड़ रह गई है. सूची से हटाए गए मतदाताओं में 61 लाख से अधिक नाम शामिल थे जिन्हें निश्चित रूप से सूची से हटा दिया गया, और 60 लाख से अधिक ऐसे मतदाता थे जिनकी पात्रता 'तार्किक विसंगतियों' के कारण अभी तय नहीं हो सकी है. यह समूह राज्य के कुल मतदाताओं का लगभग 8.5% है. इन 'संदिग्ध और लंबित मामलों' को चुनाव आयोग ने 'अंडर एड्जुडिकेशन' के रूप में चिह्नित किया है. इनको आगे की जांच और निपटारे के लिए पश्चिम बंगाल और पड़ोसी राज्यों के 700 से अधिक न्यायिक अधिकारियों को सौंपा गया था. राज्य में चुनाव कार्यक्रम की घोषणा उस समय की गई जब पश्चिम बंगाल के 60 लाख मतदाताओं को पता ही नहीं था कि वे वोट दे पाएंगे या नहीं. मतदाता चुनाव आयोग के निर्णय के ख़िलाफ़ दो तरीकों से अपील कर सकते हैं, जैसा कि आयोग ने सुझाया है. वे www.ecinet.eci.gov.in पर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं या ज़िला मजिस्ट्रेट, उप-मंडल मजिस्ट्रेट या उप-मंडल अधिकारी के कार्यालय में ऑफ़लाइन अपील जमा कर सकते हैं. चुनाव आयोग की अधिसूचना के अनुसार, अधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे कि अपील को डिजिटाइज कर "जल्द से जल्द" वेबसाइट पर अपलोड किया जाए. 'अंडर एडज्यूडिकेशन' के रूप में चिह्नित मतदाताओं को शामिल या बाहर करने के निर्णय के ख़िलाफ़ सभी अपीलों की सुनवाई 19 अपीलीय न्यायाधिकरण में होगी. सुप्रीम कोर्ट ने 10 मार्च को ऐसे न्यायाधिकरण बनाने के निर्देश दिए थे. हर न्यायाधिकरण में एक पूर्व न्यायाधीश शामिल होगा और वह पश्चिम बंगाल के एक या अधिक ज़िलों से आने वाली अपीलों की सुनवाई करेगा. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में कम अंतर से जीत असामान्य नहीं है. उदाहरण के लिए 2021 के विधानसभा चुनाव में दिनहाटा सीट से बीजेपी के निशीथ प्रमाणिक ने तृणमूल कांग्रेस के उदयन गुहा को केवल 57 वोटों से हराया था. 2021 में नंदीग्राम में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी और उनके पूर्व सहयोगी और हाल में पार्टी बदलने वाले शुवेंदु अधिकारी के बीच हुए मुकाबले में जीत का अंतर केवल 1956 वोट था. भवानीपुर सीट पर इस बार ममता बनर्जी और शुवेंदु अधिकारी के बीच मुकाबला हो रहा है. इस सीट पर लगभग 14,154 मतदाता 'अंडर एडज्यूडिकेशन' के रूप में चिह्नित किए गए थे. कई लोगों को लगता है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं को हटाने और 'अंडर एडज्यूडिकेशन' में रखने से चुनाव परिणामों पर असर पड़ सकता है. लेकिन कोलकाता के वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक शुभमोय मैत्रा इससे सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि मतदाताओं और निर्वाचन क्षेत्रों का सांख्यिकीय सर्वेक्षण किए बिना, केवल यह देखकर कि कितने मतदाताओं को हटाया गया या 'अंडर एडज्यूडिकेशन' में रखा गया, चुनाव परिणामों पर नतीजा नहीं निकाला जा सकता. उन्होंने बीबीसी को बताया, "ऐसी धारणा है कि अगर किसी सीट पर कोई पार्टी एक निश्चित अंतर से जीती थी और वहां से हटाए गए मतदाताओं की संख्या उसी के आस-पास है, तो इस बार नतीजा बदल सकता है. लेकिन यह सही नहीं है. हमारे पास मतदाता हटाने से जुड़े आंकड़े नहीं हैं, इसलिए हम यह सटीक अनुमान नहीं लगा सकते कि एसआईआर का चुनावी परिदृश्य पर कितना असर पड़ेगा." उन्होंने कहा, "यह मानने के लिए कि अयोग्य मतदाताओं को हटाने से किसी विशेष पार्टी को बड़ा नुकसान होगा, एक विशेष नैरेटिव को साबित करना होगा." उन्होंने कहा, "यह धारणा, जिस पर पश्चिम बंगाल में अक्सर चर्चा होती है, यह बताती है कि जो भी पार्टी सत्ता में होती है, वह गड़बड़ी करती है." उनका कहना है कि यह धारणा ग़लत हो भी सकती है और नहीं भी, लेकिन इसके समर्थन में पर्याप्त आंकड़े नहीं हैं. उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल में भ्रष्टाचार और अव्यवस्था, सांप्रदायिकता और राजनीतिक दलों की संगठनात्मक ताक़त जैसे अन्य कारण भी चुनाव प्रक्रिया में अधिक असर डाल सकते हैं. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

स्रोत: BBC Hindi