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US-ईरान वॉर के 103 दिन: जून में बढ़ी युद्ध की गर्मी से बेहाल हो सकता है भारत, जानें किस सेक्टर पर सबसे ज्यादा खतरा

West Asia Tensions: मिडिल ईस्ट में युद्ध का तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है और हालात थमने के बजाय और गंभीर होते दिख रहे हैं. 28 फरवरी 2026 को शुरू हुए इस संघर्ष के 103 दिन बाद भी स्थायी समाधान नहीं निकल सका है. 8 अप्रैल 2026 को हुआ अस्थायी युद्धविराम जून आते-आते टूट गया, जिसके बाद 7 जून को इजरायल ने ईरान के तेहरान, तबरीज, करज और इस्फहान जैसे कई बड़े शहरों पर हमला कर दिया.

और बिगड़ सकते हैं हालात

इसके जवाब में ईरान ने उत्तरी इजरायल की ओर मिसाइलें दागीं, जिससे क्षेत्र में तनाव अपने चरम पर पहुंच गया. 8 जून को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दोनों देशों से हमले रोकने की अपील की, लेकिन हालात और बिगड़ गए. 9 जून को ट्रंप ने दावा किया कि ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में अमेरिकी अपाचे हेलिकॉप्टर को मार गिराया, जिसके बाद अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई करते हुए ईरान के कई ठिकानों पर हमले किए. 10 जून को ईरान ने भी पलटवार करते हुए बहरीन, कुवैत और जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया.

ताजा हालात में अमेरिका ने होर्मुज के पास ईरान के केशम, बंदर अब्बास, सिरिक, बुशहर, इस्फहान और अहवाज जैसे इलाकों में बड़े हमले किए हैं, जहां एयर डिफेंस सिस्टम, रडार और ड्रोन ठिकानों को निशाना बनाया गया. वहीं ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई जारी रखते हुए अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए हैं और चेतावनी दी है कि हर हमले का जवाब दिया जाएगा. जॉर्डन ने दावा किया है कि उसने ईरान की पांच मिसाइलों को मार गिराया है. इस बीच इजरायल ने दक्षिणी लेबनान में हिजबुल्लाह के छह ठिकानों पर बमबारी की है, जबकि हिजबुल्लाह ने भी इजरायली सैन्य ठिकानों पर हमले किए हैं.

भारत पर जंग का बड़ा असर

इस युद्ध का असर भारत पर भी साफ दिखने लगा है, खासकर खाद और कृषि क्षेत्र में. जून में खरीफ फसलों की बुवाई शुरू हो चुकी है, ऐसे में अगर युद्ध लंबा खिंचता है तो खाद की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हो सकती है. भारत यूरिया और डीएपी जैसे उर्वरकों का बड़ा आयातक है और एलएनजी भी बाहर से मंगाता है, जो यूरिया उत्पादन के लिए जरूरी है. आपूर्ति प्रभावित होने पर खेती की लागत बढ़ने और खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ने की आशंका है. यही कारण है कि उर्वरक विभाग ने 2026-27 के लिए सब्सिडी बजट को 1.71 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर 3.42 लाख करोड़ रुपये करने की मांग की है.

आंकड़े भी स्थिति की गंभीरता को दिखाते हैं. फरवरी 2026 में जहां यूरिया की कीमत 447 डॉलर प्रति टन थी, वहीं जून तक यह बढ़कर 947 डॉलर प्रति टन हो गई, यानी चार महीनों में 112% की वृद्धि. भारत हर साल करीब 6.01 करोड़ टन खाद की खपत करता है और 47% आबादी खेती पर निर्भर है, ऐसे में कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर करोड़ों किसानों पर पड़ेगा. 2026-27 खरीफ सीजन के लिए 194 लाख टन यूरिया और 59 लाख टन डीएपी की मांग का अनुमान है, जिसे पूरा करना चुनौती बन सकता है.

मिडिल ईस्ट का यह संघर्ष सिर्फ क्षेत्रीय नहीं रहा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत जैसे देशों की कृषि व्यवस्था पर भी इसका गहरा असर पड़ रहा है. यदि जल्द शांति नहीं बनी, तो आने वाले समय में इसका असर खाद्य कीमतों, सब्सिडी के बोझ और आम आदमी की जेब पर साफ दिखाई देगा.

स्रोत: ABP Hindi