"स्वतंत्र भारत और पाकिस्तान बनने के करीब 80 साल बाद भी यहां के आम लोगों के बीच एक-दूसरे को लेकर नकारात्मक सोच हावी है और दोनों देश एक-दूसरे को सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं." हाल में जारी हुए अमेरिकी थिंक टैंक प्यू रिसर्च के वैश्विक व्यवहार सर्वे में यह बात सामने आई है, इसमें लोगों की धारणाओं, राय और विश्वास को मापा गया है. सर्वे में भाग लेने वाले 91 फ़ीसदी पाकिस्तानी वयस्कों की राय भारत को लेकर प्रतिकूल रही. जबकि भारत में पाकिस्तान को लेकर नकारात्मक राय रखने वाले सर्वे में शामिल वयस्क 78 फ़ीसदी थे. प्यू रिसर्च ने अपनी सर्वे रिपोर्ट में यह भी बताया है कि भारत और पाकिस्तान का यही रुख़ बीते एक दशक के सर्वेक्षणों में दिखता आया है. ऐसे में सवाल है कि आख़िर क्यों दोनों देशों की एक-दूसरे को लेकर बदग़ुमानी ख़त्म नहीं होती? एक-दूसरे को लेकर विरोध की भावना देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां. अच्छे द्विपक्षीय संबंध बनाने के एक-दूसरे के इरादों पर अविश्वास वर्ल्ड ऑर्डर को लेकर दोनों देशों में अलग राय प्यू रिसर्च सेंटर का यह सर्वे फरवरी-अप्रैल 2026 के दौरान 3,566 भारतीय वयस्कों से फ़ेस टू फ़ेस इंटरव्यू के आधार पर किया गया. सर्वे 13 भारतीय भाषाओं में कराया गया और इसके रिज़ल्ट को राष्ट्रीय आबादी के अनुरूप बनाने के लिए सांख्यिकीय वेटिंग का उपयोग हुआ. पाकिस्तान में यह सर्वे 8 अप्रैल से 7 मई 2026 के बीच 1,039 वयस्कों से समान मैथेडोलॉजी से किया गया. यह सर्वे पांच पाकिस्तानी भाषाओं में कराया गया. प्यू रिसर्च सेंटर के 2013 से अब तक के सर्वेक्षणों में 20% से अधिक भारतीयों ने कभी भी पाकिस्तान को लेकर अच्छा रुख़ नहीं जताया. वहीं, पाकिस्तान में भी भारत के प्रति दृष्टिकोण आमतौर पर नकारात्मक रहा है. पिछले सर्वेक्षणों में भारत के प्रति सकारात्मक राय रखने वालों का प्रतिशत सिंगल डिजिट से लेकर लगभग एक-तिहाई (33%) तक रहा है. इस सर्वे के नतीज़ों को लेकर बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने वरिष्ठ और जाने-माने राजनीतिक पत्रकार विनोद शर्मा से बात की. विनोद शर्मा ने कहा, "एक ज़माना था जब पाकिस्तान में भारत विरोधी भावनाएं बहुत ज़्यादा थीं. हमारे देश में एक आकांक्षा थी कि हम रिश्ते ठीक करें. बात यह है कि एक ज़माने में एक स्ट्रॉन्ग लॉबी होती थी, जो 'पीस विद पाकिस्तान' वाली थी." "वो लॉबी अब कमज़ोर हो गई है या अदृश्य हो गई है. क्योंकि जो लोग अपना मुकाम छोड़कर आए थे, वो जनरेशन लगभग समाप्त है और नई जनरेशन को पाकिस्तान के बारे में कुछ और ही सिखाया गया है." वहीं, बीबीसी उर्दू के पूर्व पत्रकार सक़लैन इमाम का मानना है कि दोनों देशों के लोग पब्लिक में अपनी सही राय रखने से झिझकते हैं. सक़लैन कहते हैं, "अगर आप किसी स्कूल, कॉलेज में, यूथ के बीच या प्रोफ़ेशनल ग्रुप में जाएंगे तो वहां ज़्यादातर लोग वही नैरेटिव बोलेंगे या वही राय रखेंगे, जो स्टेट की होती है. वो स्वतंत्र राय नहीं रखेंगे क्योंकि कोई विवाद में नहीं पड़ता चाहता." इमेज स्रोत, Philip Brown/Getty Images इस सर्वे में यह भी सामने आया कि दोनों ही देशों के लोग यह मानते हैं कि उनकी सरकार अपने पड़ोसी से अच्छे संबंध बनाने के लिए प्रतिबद्ध है, मगर दूसरे देश की सरकार ऐसा नहीं चाहती. इस पर वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा कहते हैं, "आज हमारे दोनों देशों में अमन और शांति की बात करना, जंग की बात करने से ज़्यादा मुश्किल हो गया है." "आम लोगों के मन में एक-दूसरे के ख़िलाफ़ दुश्मनी पैदा कर दी गई है. आजकल हम लोकतंत्र के रूप में उतने अपरिपक्व लग रहे हैं, जितना पाकिस्तान है." वहीं पत्रकार सक़लैन इमाम का कहना है कि पाकिस्तानी दोनों देशों के बीच व्यापार शुरू करने के पैरोकार हैं. सक़लैन कहते हैं, "छोटे कारोबारी और व्यापारियों से जब बात होती है तो वो यह नहीं कहते कि भारत हमारा दोस्त है, लेकिन वो यह सब मानते हैं कि अगर पाकिस्तान को आर्थिक तौर पर तरक्की करनी है तो दोनों देशों को बातचीत करनी होगी और ट्रेड बढ़ानी होगी." सर्वे के मुताबिक़, भारत में चीन को लेकर नकारात्मकता और उसे खतरे के तौर पर देखे जाने की बात दिखती है. सर्वे में शामिल 21 प्रतिशत भारतीयों ने चीन को सबसे बड़ा ख़तरा माना. जबकि सर्वे में शामिल 75 फ़ीसदी पाकिस्तानियों ने चीन को सबसे अहम सहयोगी बताया. सक़लैन का कहना है, "पाकिस्तान को सबसे ज़्यादा समर्थन चीन से मिला है, चाहे वो वीटो (यूएन में) की बात हो, आर्थिक समर्थन की बात या टेक्नोलॉजी के सपोर्ट की बात हो, चीन आगे रहा है." भारत और चीन के पारंपरिक रिश्तों को लेकर विशेषज्ञों के अलग रुख़ हैं. सक़लैन का मानना है, "चीन पिछले दो या तीन दशक में एक बड़ी ताकत बनकर उभरा है. अगर आप इतिहास उठाकर देखेंगे तो 1962 की जंग से पहले चीन, भारत का दोस्त था." साथ ही वह कहते हैं कि "भारत और पाकिस्तान के रिश्तों के बीच चीन कोई फ़ैक्टर नहीं है." उधर, विनोद शर्मा का मानना है कि नेहरू के समय भी भारत सरकार, चीन को एक बड़ी चुनौती मानती थी. विनोद शर्मा कहते हैं, "एक बार रॉ के पूर्व चीफ़ रामनाथ काव (आरएन काव) ने एक बार मुझसे ज़िक्र किया था कि पंडित नेहरू के बारे में इतनी बातें की जाती हैं कि वह चीन से प्रेम करते हैं, यह गलत है. क्योंकि भारत की आज़ादी के बाद पहली इंस्पेक्टर जनरल की कॉन्फ्रेंस में पंडित नेहरू ने कहा था कि हमको ऐसा लगता हो कि हमारे लिए बड़ा चैलेंज पाकिस्तान है, लेकिन सच्चाई में हमारे लिए बड़ा चैलेंज चीन है." प्यू सर्वे के अनुसार, भारत रूस और फिर अमेरिका पर सबसे अधिक भरोसा करता है, जबकि पाकिस्तान का भरोसा सबसे ज्यादा चीन और फिर रूस पर है. ध्यान देने वाली बात यह है कि ये परिणाम ऐसे समय में आए हैं जब अमेरिकी राष्ट्रपति वैश्विक मंचों से पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका की तारीफ़ करते रहे हैं और भारत के ऊपर पिछले एक साल के भीतर कई बार टैरिफ़ लगा चुके हैं. विनोद शर्मा इस बात से सहमत नहीं हैं कि आम पाकिस्तानी, अमेरिका को ख़तरा मानते हैं. बल्कि वे कहते हैं कि अमेरिका के लिए पाकिस्तान ही ईरान से युद्ध में मध्यस्थता के लिए वार्ता कर रहा है. अमेरिका के लिए वे पाकिस्तान की जियो पॉलिटिकल हैसियत को अहम मानते हैं. उन्होंने कहा, अमेरिका, पाकिस्तान से रिश्ते इसलिए रखना चाहता था कि अगर आप रीजन का नक्शा देखें तो इसकी एक महत्वपूर्ण भूमिका है. पाकिस्तान उनकी कठपुतली था. भारत उनका कभी क्लाइंट स्टेट (कठपुतली) नहीं रहा." उधर, सक़लैन का कहना है कि भले आम पाकिस्तानी चीन को ज़्यादा पसंद करते हैं मगर उनका ख़्वाब अमेरिका जाकर रुपया कमाने का होता है. रूस को लेकर विनोद शर्मा का कहना है, "अमेरिका मुफ़्त में कभी किसी को कुछ नहीं देता. रूस ने हमें बहुत कुछ दिया है. भारत को संतुलन बनाकर चलना चाहिए." इमेज स्रोत, Sondeep Shankar/Getty Images बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. 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स्रोत: BBC Hindi