इमेज स्रोत, Alexander NEMENOV / POOL / AFP via Getty Images तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के विस्तार की चर्चा तेज़ हो गई है. ऐसी अटकलें हैं कि भारत का एक और पड़ोसी देश बांग्लादेश भी इस समझौते का हिस्सा बन सकता है. बांग्लादेश के विदेश मंत्री ख़लीलुर रहमान ने भी संकेत दिया है कि अगर समझौते में शामिल देशों की ओर से ढाका को निमंत्रण मिलता है, तो सरकार इस पर सकारात्मक रूप से विचार करेगी. हालांकि, मक्का समझौते के सदस्य देशों की ओर से बांग्लादेश को समझौते में शामिल करने को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. इन चर्चाओं को बांग्लादेश के विदेश मंत्री ख़लीलुर रहमान के गुरुवार (27 अगस्त) को संसद में दिए बयान के बाद और बल मिला. उन्होंने मक्का रक्षा समझौते को लेकर सरकार का रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि अगर समझौते के सदस्य देश बांग्लादेश को इसमें शामिल करना चाहते हैं, तो ढाका इसे सकारात्मक रूप से देखेगा. हालांकि, एक्सपर्ट्स मानते हैं कि विदेश मंत्री का यह बयान बांग्लादेश की पुरानी नीतियों से विरोधाभासी साबित होता है. उनके अनुसार, जो देश लिबरेशन मूवमेंट से बना और सेकुलर नीतियों पर चला, अब वह मुस्लिम पहचान की ओर बढ़ता जा रहा है. इमेज स्रोत, Alexander NEMENOV / POOL / AFP via Getty Images दरअसल, बांग्लादेश की निर्दलीय सांसद रुमीन फ़रहाना ने संसद में सवाल किया था कि मक्का रक्षा समझौते में बांग्लादेश के शामिल होने से देश को क्या लाभ हो सकता है. इसके जवाब में विदेश मंत्री ख़लीलुर रहमान ने कहा, "यह समझौता तीन देशों के बीच हुआ है. हम इसे सकारात्मक रूप से देखते हैं. इसमें शामिल होना है या नहीं, यह सवाल अभी नहीं आया है, क्योंकि यह समझौते के सदस्य देशों की इच्छा पर निर्भर करता है. अगर वे बांग्लादेश को इस समझौते में शामिल करने की इच्छा जताते हैं, तो हम निश्चित रूप से इसे सकारात्मक रूप से देखेंगे." देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां. उन्होंने कहा कि फ़िलहाल समझौते के फ़ायदे और नुकसान पर चर्चा करना ज़रूरी नहीं है. सरकार ज़रूरत पड़ने पर सभी पहलुओं पर विचार करेगी. ख़लीलुर रहमान ने कहा, "हालांकि, हमें यह ध्यान रखना होगा कि अगर यह समझौता आगे बढ़ता है, तो यह दुनिया के मुस्लिम समुदाय की अपनी सुरक्षा के लिए एक क़दम है. यह हमारा परिवार है. यह मुस्लिम परिवार का अंदरूनी मामला है. इसके बारे में किसी और की चिंता की कोई जगह नहीं है." ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर और जिंदल सेंटर फ़ॉर इसराइल स्टडीज़ के डायरेक्टर ख़ींवराज जांगिड़ मानते हैं कि यह बांग्लादेश का 'यू-टर्न' है. उनका कहना है कि बांग्लादेश ख़ुद को सेकुलर देश के तौर पर पेश करता आया है, फिर भी वहाँ के विदेश मंत्री की ओर से 'मुस्लिम परिवार' जैसी बात कहना उनकी छवि से इतर है. उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "जब पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बना तो उनकी फ़िलॉसफ़ी यही थी कि हम एक सेकुलर, डेमोक्रेटिक और सोशलिस्ट स्टेट बनाएंगे. मक्का समझौता सेकुलर नहीं है, क्योंकि इसके तीनों सदस्य देशों की मुस्लिम छवि है और इस्लामिक मुद्दों को लेकर काम करते हैं.'' वो कहते हैं, ''सऊदी अरब तो इस्लामिक राजनीति पर ही खड़ा है. जबकि बीते तीस सालों में तुर्की में भी आइडेंटिटी पॉलिटिक्स ही हो रही है. पाकिस्तान ख़ुद को 'इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान' कहता है. अब बांग्लादेश इन देशों के साथ आने की बात कर रहा है तो स्पष्ट है कि वह मुस्लिम देशों के साथ ख़ुद को जोड़ रहा है. उन्हीं के साथ रीजनल गठबंधन बना रहा है." वहीं, बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख और संसद में विपक्ष के नेता शफ़ीकुर रहमान मानते हैं कि मक्का समझौते में शामिल होना बांग्लादेश का संप्रभु और आंतरिक मामला है. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, "अगर बांग्लादेश अपने लोगों की ज़रूरतों और हितों को ध्यान में रखते हुए कोई फ़ैसला लेता है, तो किसी और के लिए इससे परेशान या दुखी होने की कोई वजह नहीं है." बांग्लादेश में सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों का ही मानना है कि इस समझौते में शामिल होना उनके लिए 'फ़ायदेमंद' रहेगा. लिहाज़ा, विशेषज्ञ भी मानने लगे हैं कि बांग्लादेश मक्का समझौते में शामिल हो तो इस पर हैरानी नहीं जतानी चाहिए. इमेज स्रोत, Turkish Presidency / Murat Cetinmuhurdar / Handout/Anadolu via Getty Images मक्का रक्षा समझौता सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच 7 अगस्त 2026 को साइन किया गया एक त्रिपक्षीय (तीन देशों का) सैन्य समझौता है. इस समझौते के मुताबिक़, अगर इनमें से किसी भी एक देश पर बाहरी हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा. यह प्रावधान बिल्कुल नेटो के 'आर्टिकल 5' की तरह काम करता है. बांग्लादेश के मक्का रक्षा समझौते में शामिल होने की चर्चा उस समय भी तेज़ हुई थी, जब विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर ने सऊदी अरब के विदेश मंत्री एचएच प्रिंस फ़ैसल बिन फ़रहान अल सऊद से मुलाक़ात की. दोनों नेताओं की मुलाक़ात जेद्दा में इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) की बैठक के दौरान हुई थी. इसके बाद बांग्लादेश के संभावित रूप से मक्का समझौते में शामिल होने को लेकर अटकलें तेज़ हो गईं. हुमायूं कबीर ने सोमवार को विदेश मंत्रालय की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी थी. उन्होंने कहा था कि बांग्लादेश ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में रुचि व्यक्त की है. उन्होंने कहा, "बांग्लादेश के लोगों का मक्का से भावनात्मक संबंध है. यदि मध्य पूर्व में इस्लामी देशों के बीच कोई सुरक्षा समझौता होता है, तो उसमें शामिल होना कोई असामान्य बात नहीं होगी." कबीर ने कहा कि बांग्लादेश इस मामले को सकारात्मक नज़रिए से देख रहा है. उन्होंने यह भी दावा किया कि बांग्लादेश के नेतृत्व, ख़ास तौर पर प्रधानमंत्री तारिक़ रहमान, को इसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है. बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय के एक सूत्र ने रॉयटर्स को बताया कि सऊदी अरब ने बांग्लादेश को मक्का रक्षा समझौते में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है. हालांकि, सूत्र ने यह नहीं बताया कि सऊदी अरब की ओर से यह निमंत्रण कब दिया गया था. सूत्र ने अपनी पहचान उजागर नहीं की, क्योंकि उन्हें मीडिया से बात करने की अनुमति नहीं थी. बीबीसी की बांग्ला सेवा के मुताबिक़ अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर इनाम ख़ान का कहना है कि बांग्लादेश की सुरक्षा व्यवस्था फ़िलहाल बहुत मज़बूत नहीं है. ऐसे में संभावित रक्षा सहयोग उसके लिए फ़ायदेमंद हो सकता है. उनका कहना है कि सऊदी अरब आर्थिक रूप से मज़बूत देश है, जबकि तुर्की और पाकिस्तान सैन्य क्षमता और रणनीतिक अनुभव के लिहाज़ से महत्वपूर्ण हैं. ऐसे में इन देशों के साथ सहयोग से बांग्लादेश को फ़ायदा हो सकता है. प्रोफ़ेसर ख़ान ने बीबीसी न्यूज़ बांग्ला से कहा, "एक और महत्वपूर्ण मुद्दा रोहिंग्या संकट है. चूंकि बांग्लादेश रोहिंग्या संकट का समाधान ढूंढ रहा है, इसलिए बांग्लादेश का मानना है कि पाकिस्तान और तुर्की इस संबंध में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं." अंतरराष्ट्रीय मामलों की विशेषज्ञ और जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर रेशमा काज़ी भी मानती हैं कि यह बांग्लादेश के लिए पॉजिटिव डेवलपमेंट है. उन्होंने कहा, "बांग्लादेश खुद इस समझौते में शामिल होने को उत्सुक दिख रहा है. ये एक कलेक्टिव डिफ़ेंस मॉडल है, जो बांग्लादेश अपने लिए अहम मान रहा है. इससे उसे रक्षा मजबूती मिलेगी, साथ ही तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब जैसे मजबूत मुस्लिम देशों के साथ रिश्ते गहरे होंगे. रक्षा सुनिश्चित होने के साथ-साथ वह खुद अपना आर्थिक फ़ायदा भी देख रहा है, जो उन तीनों देशों से लिया जा सकता है." हालांकि, संभावित फ़ायदे के साथ बांग्लादेश के लिए कुछ जोख़िम भी देखे जा रहे हैं. शोधकर्ता और विश्लेषक अल्ताफ़ परवेज़ ने बीबीसी बांग्ला से बातचीत में कहा कि अगर बांग्लादेश इस गठबंधन में शामिल होता है तो पड़ोसी देश भारत इसे लेकर चिंतित हो सकता है. उनके मुताबिक़, इसका असर दक्षिण एशिया की सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है और क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ने की आशंका पैदा हो सकती है. परवेज़ ने बीबीसी बांग्ला से कहा, "अगर भारत ख़ुद को असुरक्षित महसूस करता है तो वह इसराइल के साथ अपने सुरक्षा सहयोग को और मज़बूत कर सकता है. इससे दक्षिण एशिया में सैन्य तनाव बढ़ने के साथ-साथ परोक्ष युद्ध और प्रॉक्सी समूहों की गतिविधियां भी बढ़ सकती हैं." उन्होंने कहा कि बांग्लादेश के सामने दोनों ही परिस्थितियों में जोख़िम मौजूद है. समझौते की ओर बढ़ने पर एक तरह का ख़तरा हो सकता है, जबकि इससे दूरी बनाए रखने पर दूसरे तरह के रणनीतिक जोखिम सामने आ सकते हैं. प्रोफ़ेसर रेशमा काज़ी भी मानती हैं कि भारत और बांग्लादेश के रिश्ते पहले से ही नाज़ुक दौर में हैं और ऐसा होने पर दोनों देशों के रिश्तों में दूरियां आनी तय हैं. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. 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स्रोत: BBC Hindi