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अंतरराष्ट्रीय मदद लेने का फ़ैसला नेपाल ने एक ही दिन में क्यों बदला, वहाँ के मीडिया में कैसी चर्चा

✍️ Admin 📅 29 August, 2026 ⏰ 09:38 AM 👁 13 views

नेपाल ने भीषण बाढ़ के बाद खोज और बचाव अभियान के लिए विदेशी मदद की पेशकश पहले ठुकरा दी थी. लेकिन अब उसने अपना फ़ैसला बदल दिया है. नेपाल के प्रमुख अख़बार 'काठमांडू पोस्ट' के मुताबिक़ नेपाल ने अपना फ़ैसला उन देशों के दबाव में किया है, जिनके नागरिक इस भीषण आपदा में अब भी लापता हैं. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़ शुक्रवार को नेपाल के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लोक बहादुर छेत्री ने कहा था "मदद की पेशकश स्वाभाविक है. हमारी सुरक्षा एजेंसियां ​​खोज और बचाव अभियान चला रही हैं. फ़िलहाल हमें ऐसी मदद की ज़रूरत नहीं है." लेकिन नेपाल अब भोटेकोशी नदी में आई बाढ़ से प्रभावित इलाक़ों में लोगों को तलाशने और बचाव कार्य में अंतरराष्ट्रीय सर्च एंड रेस्क्यू टीमों की मदद लेने के लिए तैयार है. नेपाल में बुधवार को भोटेकोशी और त्रिशूली नदी में अचानक आई बाढ़ में शुक्रवार तक 616 लोगों की मौत हो चुकी है और क़रीब 2000 लोग लापता हैं. 320 भारतीय भी लापता हैं. 'काठमांडू पोस्ट' के मुताबिक़ बुधवार को नेपाल सरकार ने कहा था कि नेपाली बचाव दल खोज और बचाव अभियान चलाने में सक्षम हैं. नेपाल दूसरे देशों की रेस्क्यू टीमों को काम करने की इजाज़त नहीं देगा. लेकिन उसका फ़ैसला एक दिन भी नहीं टिक सका. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़ अब प्रशासन ने सुरंगों में रेस्क्यू, डीएनए टेस्टिंग और फोरेंसिंक जांच के लिए विदेशी विशेषज्ञों की सीमित मदद लेने का फ़ैसला किया है. सरकार के नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट सेंटर के आकलन के आधार पर सरकार की अंतर मंत्रालय समन्वय समिति ने भारत, चीन, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया को कहा है कि वो अपने एक्सपर्ट्स और तकनीशियनों को भेज सकते हैं. ये लोग सुरंगों में रेस्क्यू, डीएनए टेस्टिंग और फोरेंसिंक जांच में अपनी विशेषज्ञता का इस्तेमाल करेंगे. दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्रालय ने शुक्रवार को समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया था कि नेपाल विदेशी एक्सपर्ट्स मदद लेने के लिए राजी नहीं था. उसने नेपाल को अंतरराष्ट्रीय संगठनों के ज़रिये 10 लाख डॉलर की मानवीय सहायता की भी पेशकश की थी. बुधवार को उसके विदेश मंत्रालय ने बताया था एक पनबिजली संयंत्र में उसके नौ नागरिक लापता हैं और 10 फँसे हुए हैं. देश - दुनिया की बड़ी ख़बरें जिन्होंने बटोरी सुर्खियां. संयुक्त राष्ट्र में नेपाल के पूर्व राजदूत दिनेश भट्टराई ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को कहा था कि नेपाल शायद इसलिए विदेशी एक्सपर्ट्स की मदद नहीं लेना चाहता था क्योंकि बाढ़ प्रभावित रसुवा ज़िला चीन के तिब्बत से सटा हुआ है. तिब्बत चीन के लिए सबसे संवेदनशील क्षेत्रीय मुद्दों में से एक है. तिब्बत चीन का एक स्वायत्त क्षेत्र है और नेपाल अपने से कहीं बहुत अधिक बड़े पड़ोसी देश के साथ लंबे समय से एक नाज़ुक संतुलन बनाए हुए है. भट्टराई ने रॉयटर्स को बताया, "नेपाल ने शायद क्षेत्र की भौगोलिक संवेदनशीलता के बारे में सोचकर ही पहले विदेशी टीमों को मदद की पेशकश को ठुकराया होगा. '' हालांकि विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता छेत्री ने कहा कि इस फ़ैसले में चीन का ये पहलू शामिल नहीं था. ये फ़ैसला इसलिए किया गया था कि नेपाल की अपनी बचाव टीमें ही इस अभियान को संभाल रही थीं. रॉयटर्स के मुताबिक़ चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने शुक्रवार को बताया कि प्रधानमंत्री ली कछियांग ने गुरुवार दोपहर को तिब्बत के ग्यिरोंग का दौरा किया था, जहां बाढ़ का पानी और मलबा घुस गया था. नेपाल में बाढ़ के बाद बचाव और राहत काम में काफ़ी दिक्कतें आ रही हैं. कई इलाके अब भी कटे हुए हैं. और वहां से बाढ़ के भयावह ब्योरे सामने आ रहे हैं. 'काठमांडू पोस्ट' के संवाददाता अर्जुन पौडेल ने अख़बार के लिए लिखी अपनी रिपोर्ट में बताया कि कैसे बाढ़ का पानी उनके गांव को पल भर में बहा ले गया. उन्होंने अपनी आपबीती में लिखा, ''मैं बुधवार की सुबह काठमांडू में कांतिपुर पब्लिकेशन के दफ़्तर जा रहा था कि रास्ते में पत्नी ने फ़ोन किया.'' '' उसने कहा, ''त्रिशूली नदी में बाढ़ आ गई है. सोल बाज़ार और बेत्रावती में तबाही मची है. लोग कह रहे हैं कि अब कुछ भी नहीं बचा है. लोग सड़कों पर आ गए हैं. घबराए लोगों के वीडियो वायरल हो रहे हैं.'' ''सोल मेरा ही गांव था. लेकिन ये जगह ऐसी नहीं थी कि जहां कोई नदी पहुंचती हो. मैंने ये भी नहीं सुना था कि तेज बारिश हुई है. लेकिन मैंने पत्नी की बात की पुष्टि के लिए न्यूज़ वेबसाइट खोली. मुझे लग रहा था कि कुछ नहीं होगा. लेकिन वेबसाइट खुलते ही सामने आया- त्रिशूली नदी में बाढ़.'' ''मेरे सीने में अजीब सी जकड़न सी महसूस हुई. मैंने एक पत्रकार निरंजन को फ़ोन किया, जिनका परिवार सोल बाज़ार में रहता था. उसने छूटते ही कहा -मैंने भी सुना है. मैं किसी से संपर्क नहीं कर पा रहा हूं न मां से न बुआ से और न चाचा या चाची से. किसी को फ़ोन नहीं लग रहा है.'' ''हम एक दूसरे से बात करते रहे. बाद में गांव की एक भाभी से संपर्क हो पाया. उन्होंने कहा, गांव में कुछ भी नहीं बचा है. ज़्यादातर लोग मारे गए हैं.'' ''मुझे इस पर विश्वास नहीं हुआ. सोल और तुपचे नदी की सतह से लगभग सौ मीटर ऊंचाई पर थे. सदियों से वहां कोई बढ़ नहीं आई थी. इतनी ऊंचाई तक पानी कभी नहीं पहुंचा था. मैं 44 साल का हूं और मैंने अब तक की अपनी ज़िंदगी को नदी को कभी इतना पास आते नहीं देखा था.'' ''मेरे सारे रिश्तेदार वहां था. मेरे चचेरे भाई. पड़ोसी. बचपन के दोस्त. हर किसी से जिससे मैं प्यार करता था सब उस गांव के थे.'' ''मैंने सबको एक-एक कर फ़ोन करना शुरू किया. सोल जैसी जगह हर कोई हर किसी को जानता था. सब एक दूसरे से दिल से जुड़े थे. हर कोई मेरा था. धीरे-धीरे मेरे फ़ोन पर वीडियो और तस्वीरें आनी शुरू हो गईं. जो दिख रहा था उसके लिए मैं कतई तैयार नहीं था.'' '' मेरी ताई भी बाढ़ में बह गई थीं. उनका बेटा यानी मेरे भाई मधु भी बह गए थे. उनके साथ उनकी पत्नी भी. मेरी एक दूसरी चाची भी बह गई थीं. उनका पोता और उसकी पत्नी भी. उनके अपने बेटे और बहू का पता नहीं था. मेरे मामा सुबह मवेशियों के लिए घास काटने के लिए गए थे वो भी नहीं लौटे थे.'' ''निरंजन के चाचा ने फ़ोन किया था. उन्होंने बताया था कि निरंजन की मां, पिताजी, चाचा, चाची और बहन हिमानी सभी बाढ़ के पानी में बह गए थे. फ़ोन पर उनकी आवाज़ आ रही थी- सबकुछ ख़त्म हो गया है अर्जुन. अब मैं रखता हूं.'' ''बेत्रावती सिर्फ़ एक शहर नहीं था. यह वो जगह थी जहां नेपाल और तिब्बत ने युद्ध के बाद एक संधि पत्र पर दस्तख़्त किए थे. यहां उत्तर गंगा धाम है. ये पवित्र धरती मानी जाती है जहां हर साल हजारों लोग पौष अमावस्या को अपने पितरों के पिंडदान के लिए आते हैं. लेकिन अब यहां सबकुछ ख़त्म हो गया है. यहां के मंदिर, संधि मैदान और तीर्थस्थल सब गायब हो गए हैं. अब सिर्फ़ मलबा रह गया है.'' ''कोई सड़क नहीं बची. बिजली नहीं, कोई इंटरनेट नहीं. बाढ़ में त्रिशूली हाइड्रोपावर स्टेशन का मुख्य द्वार भी बह गया और हाइड्रो पावर स्टेशन भी.'' ''मैं अब ये सोच रहा हूं कि मेरा गांव अब फिर से अपने पुराने रूप में कब आएगा. किसी के पास इसका जवाब नहीं है. हममें से किसी ने ऐसी बाढ़ नहीं देखी थी जिसने एक गांव को मिनटों में ख़त्म कर दिया.'' नेपाल जिस भीषण बाढ़ से जूझ रहा है उसकी भौगोलिक वजहें भी समझने की कोशिश तेज हो गई है. कई विशेषज्ञ अब इसका विश्लेषण कर रहे हैं और नेपाल की धरती और उसके नाज़ुक भूगोल के साथ संबंध तलाश रहे हैं. काठमांडू में रहने वाले बांग्लादेश के लेखक, पॉलिसी एनालिस्ट और उद्यमी ज़ाकिर किबिरिया नेपाली टाइम्स में लिखते हैं, ''हिंदूकुश हिमालय को तीसरा ध्रुव कहा जाता है क्योंकि इसमें आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों के बाहर बर्फ का सबसे बड़ा भंडार है. वैज्ञानिक बताते हैं कि यह बर्फीला क्षेत्र वैश्विक औसत से कहीं अधिक तेज़ी से गर्म हो रहा है. विज्ञान अमूर्त है. लेकिन इस सप्ताह नेपाल में जो हुआ वह अमूर्त नहीं है.'' ''नेपाल में बाढ़ ग्लेशियल झील के विस्फोट की वजह से हुई. नेपाल भर में ये बाढ़ें लगातार बढ़ती जा रही हैं.'' 'माई रिपब्लिका' में राम सुबेदी ने लिखा, ''नेपाल की विनाशकारी बाढ़ ने भविष्य में होने वाले नुक़सान को कम करने के लिए मजबूत आपदा तैयारियों, समय पर सूचनाओं को साझा करने और बुनियादी ढांचा प्लानिंग की जरूरत को एक बार फिर उजागर किया है.'' ''रसुवा में जो हुआ उसने हिमालय के संवेदनशील इलाकों में जलवायु परिवर्तन के असर को दिखाया. ये दिखाया है कि कैसे ये इलाके जलवायु परिवर्तन के प्रति कितना संवेदनशील हो सकता है. साथ ही इसने निगरानी और वॉर्निंग सिस्टम को कमजोरियों को भी उजागर किया है.'' ''विशेषज्ञों का कहना है कि इस आपदा ने पारंपरिक आपदा राहत उपायों से आगे बढ़कर काम करने की जरूरत को रेखांकित किया है. बढ़ते तापमान से ग्लेशियर पिघल रहे हैं. जलवायु परिवर्तन की वजह से ज्यादा बारिश हो रही है. भूस्खलन हो रहा है. हिमस्खलन से नदियों के अचानक रुकने का ख़तरा पैदा हो गया है.'' बाढ़ के बाद नेपाल में सहायताकर्मी पहुंचे हैं. लेकिन कई ऐसे इलाके हैं जहां लोग फंसे हुए हैं. सड़कें और पुल नष्ट हो गए हैं. इससे बाढ़ प्रभावित रसुवा और नुवाकोट में कितने लोग फंसे हैं इसका ठीक-ठीक पता नहीं चल पा रहा है. नेपाली अख़बार 'कांतिपुर' के मुताबिक़ भोटेकोशी बाढ़ की वजह से रसुवा, नुवाकोट और धादिंग में 40 किलोमीटर सड़क और 41 पुल बह गए हैं. नेपाल सेना के एक हेलीकॉप्टर ने शुक्रवार को भोटेकोशी बाढ़ के कारण त्रिशुली बाजार स्थित त्रिभुवन त्रिशुली माध्यमिक विद्यालय में फंसे 40 छात्रों और शिक्षकों को उनके घरों तक पहुंचाया. लेकिन कुछ शिक्षक और छात्र अभी भी बचाव की प्रतीक्षा कर रहे हैं. सुवा के उत्तरगया ग्रामीण नगरपालिका के नीलकंठ स्कूल के शिक्षक माधव लामिछाने ने बताया कि बाढ़ के बाद पुलों और सड़कों को हुए नुकसान के कारण स्थानीय मरीजों को बचाने और उनका इलाज करने में दिक्कत आ रही है. 'बाढ़ त्रिशूली से बेतरावती तक के सभी पुलों को बहा ले गई है. सड़कें कीचड़ से ढकी हुई हैं.' लामिछाने ने 'कांतिपुर' को बताया कि बेत्रावती से घायल हुए लोगों को इलाज के लिए धुंचे होते हुए काठमांडू भेजा गया है. रसुवा के मुख्य जिला अधिकारी नरेंद्र परियार ने कहा कि केरंग में फंसे लोगों की सही संख्या का पता नहीं चल पाया है. उन्होंने कहा कि रसुवागढ़ी सीमा चौकी के रास्ते उन्हें नेपाल वापस भेजना संभव नहीं है. बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित. BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.

स्रोत: BBC Hindi

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